Wednesday, 26 February, 2020

SCIENCE PEDAGOGY NOTES FOR CTET/UPTET IN PDF

SCIENCE PEDAGOGY NOTES FOR CTET/UPTET IN PDF



 

प्रयोग विधि (Experiment Method)

गैरट के अनुसारप्रयोग का अर्थ है पद्धति से पूछा गया प्रश्नदूसरे शब्दों में हम कह सकते हैंनियंत्रित परिस्थितियों में किया गया निरीक्षण ही प्रयोग है” 

प्रयोगात्मक विधि के गुण (Merits of Experimental Method)

1. प्रयोगात्मक विधि वस्तुनिष्ठ और वैज्ञानिक है!

2. यह विधि अवैयक्तिक है

3. विधि की पुनरावृत्ति की जा सकती है

4. प्रयोगात्मक विधि निष्पक्ष होती है, क्योंकि एक ही समय पर एक से अधिक वैज्ञानिक एक ही घटना का प्रायः समान रूप से बारबार अध्ययन करते हैं, अतः उसके परिणामों की पुष्टि हो जाती है। 

प्रयोग विधि के दोष या परिसीमाएं (Limitations or demerits of Experimental Method)

1. इस विधि में चरों को नियंत्रित करना सरल कार्य नहीं होता हैसभी चरों को पूर्णरूप से नियंत्रित करना मुश्किल सा हो जाता 

2. प्रयोग विधि बहुत लम्बी होती है

3. नियंत्रित वातावरण में बालक के व्यवहार का अध्ययन किया जाए तो वह स्वाभाविक व्यवहार नहीं कर पाता हैउसे प्रयोगशाला  में मानकों का परिपालन करना पड़ता है, जिसके फलस्वरूप निष्कर्षों में दोष जाना स्वाभाविक है। 

4. उपयुक्त प्रयोज्यों के चयन में कठिनाई : प्रयोग जब छोटी आयु के बालकों पर किया जाता है तब उनके साथ भाव संबंध स्थापित करने में प्रयोगकर्ता को कठिनाई का सामना करना पड़ता हैइस प्रकार प्रयोग के परिणामों की विश्वसनीयता कम या गलत होने का भय रहता है

5. इसका प्रयोग अचेतन एवं मानव के सूक्ष्मव्यवहारों के अध्ययन के लिए नहीं हो सकता

6. प्रयोग विधि में एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति का अध्ययन करता हैइसलिये वह अपना या अपने विचारों का प्रभाव दूसरे पर डाल सकता है तथा पक्षपातपूर्ण रूप अपना सकता है

7. प्रयोगविधि में कई बार प्रयोज्म के सहयोग का अभाव रहता हैकई बार प्रयोज्य जानबूझकर अपने को थका हआ अथवा थका हुआ होने का बहाना कर सकता है

8. यह बहुत महंगी विधि है क्योंकि इसमें प्रयोगशाला और विभिन्न उपकरणों की आवश्यकता रहती है

. प्रत्येक घटना का अध्ययन प्रयोगशाला में संभव नहींजैसे सामान्य और असामान्य व्यक्ति का अध्ययन। 

खोज उपागम

खोज उपागम का अर्थ (Meaning of DiscoveryApproach):

खोज के संबंध में अभी भी यह भ्रम है कि

1.यह शिक्षण की विधि है या अधिगम की विधि है अथवा खोज अधिगम का स्वरूप हैकुछ लोगों का मत है कि यह समस्या समाधान की प्रविधि है, परंतु अधोलिखित अर्थ से अधिकांश व्यक्ति सहमत हैं 

2. ज्ञान को प्राप्त करने में केवल विषयों की ही शिक्षा न देकर व्यावहारिक पक्ष पर बल देना चाहिए।

3.छात्र को रूचि था अनुभव के आधार पर सीखने के लिए प्रोत्साहित करना चाहि। 

व्यवस्था (Organization) 

एकीकृत उपागम द्वारा सामान्य विज्ञान मानकर, शिक्षा प्रदान की जाती है। इस उपागम की व्यवस्था में सामान्य विज्ञान सम्पूर्ण अभिव्यक्त इकाई के रूप में प्रदान किया जाता है। अत: इनकी भिन्न-भिन्न इकाइयां नहीं होती। इस उपागम की व्यवस्था में निम्नलिखित तथ्यों पर बल दिया जाता है

1. पाठ्यक्रम को विभिन्न छोटी-छोटी इकाइयों में क्रमबद्ध रूप में विभाजित कर लिया जाता है।

2. विषय-वस्तु को सरल से कठिन की ओर संगठित किया जाता है।

3. ज्ञान प्राप्ति के लिये छात्र को पूर्ण स्वतंत्रता प्रदान की जाती है।

4. छात्र अपनी रूचि, सामर्थ्य तथा योग्यता के अनुरूप इन इकाईयों का अपनी गति के अनुसार अध्ययन करता है।

5. एक इकाई का अध्ययन समाप्त करने पर दूसरी इकाई का अध्ययन आरंभ किया जाता है और इन्हें पूरा करने में समय का कोई प्रतिबंध नहीं होता।

6. प्रतिभावान छात्र अपनी रफ्तार से कम समय में अधिकतम ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं। .

7. मंद बुद्धि एवं पिछड़े छात्र भी अपनी सीखने की रफ्तार से अध्ययन करके आगे बढ़ते जाते हैं। 

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि एकीकृत उपागम के प्रयोग से विभिन्न समस्याओं का स्वयं निराकरण हो जायेगा। इसके साथ ही शिक्षण प्रभावशाली व बालकों की रूचि के अनुरूप हो सकेगा। छात्र अपने अनुभव के आधार पर ही स्थानीय व सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप वैज्ञानिक रूप से ज्ञान प्राप्त कर सकेगा।

एकीकृत उपागम का पाठ्यक्रम (Curriculum of Integrated Approach)

एकीकृत उपागम में पाठ्यक्रम अनुभव-केन्द्रित होता है। अनुभव उद्देश्यों के अनुरूप होते हैं और अध्यापक इके द्वारा छात्रों के व्यवहार में परिवर्तन लाने का प्रयत्न करता है। अतः प्राथमिक स्तर पर इस नवीन उपागम द्वारा अनुभव केन्द्रित पाठ्यक्रम में छात्र स्वीक्रिया करके अपने अनुभव व सीखने के अनुभवों के आधार पर ज्ञान प्राप्त करता है। यह पाठ्यक्रम निम्नलिखित तथ्यों पर आधारित होता है

1. पाठ्यक्रम का जीवन केन्द्रित होना।

2. दैनिक जीवन की विभिन्न आवश्यकताओं के अनुरूप होना।

3. पाठ्यक्रम का प्रत्यक्ष संबंध जीवन से स्थापित करना

4. विषयों के समन्वित इकाई रूप पर बल देना।

5. सैद्धांतिक पक्ष की अपेक्षा व्यवहारिक पक्ष पर अधिक बल देना। 



 

निरीक्षण विधि या अवलोकन विधि 

(Observation Method) निरीक्षण विधि अनुसंधान की एक महत्वपूर्ण विधि है। शिक्षा के क्षेत्र में यह विधि अत्यधिक प्रभावपूर्ण साबित हुई है, क्योंकि विद्यार्थी के कार्यकलापों का निरीक्षण व अवलोकन कर उसकी क्षमता का अनुमान लगा कर उसका सही मार्ग-दर्शन कर सकते हैं। 

निरीक्षण को समझने के लिए विभिन्न विद्वानों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से इसे परिभाषित किया है 

डॉ. पी.वी, यंग के शब्दों में-“निरीक्षण आंखों के माध्यम से किया गया स्वाभाविक घटनाओं के संबंध में एक ऐसा क्रमबद्ध तथा विचारपूर्वक अध्ययन है, जो कि उनके घटित होने के समय पर किया जाता है।” प्रो.सी. मोजर के अनुसार-“ठोस अर्थ में निरीक्षण में कानों तथा वाणी की अपेक्षा आंखों के प्रयोग की स्वतंत्रता 

निरीक्षण के प्रकार (Kind of Observation) 

निरीक्षण मुख्यतः तीन प्रकार का होता है

1. अनियंत्रित निरीक्षण (Uncontrolled Observation)

2.नियंत्रित निरीक्षण (Controlled Observation)

3. सामूहिक निरीक्षण (Mass Observation)

1. अनियंत्रित निरीक्षण (Uncontrolled Observation) 

अनियंत्रित निरीक्षण में प्रयोगकर्ता घटना या क्रियाओं को स्वभाविक रूप से वैज्ञानिक संबंधों के अध्ययन के लिए प्रयोग करता है। इस विषय में गुडे व हाट ने लिखा है-“व्यक्तियों के पास सामाजिक व वैज्ञानिक संबंधों के बारे में जो कुछ भी ज्ञान उपलब्ध है, वह अनियंत्रित द्वारा प्राप्त होता है चाहे वह सहयोगी हो या असहयोगी।” इस प्रकार के निरीक्षण को भी हम तीन भागों में वर्गीकृत कर सकते हैं 

(i) सहभागी निरीक्षण (Participant Observation) 

(ii) असहभागी निरीक्षण (NonParticipant Observation)

(iii) अर्द्ध हभागी निरीक्षण (Quasi Participant Observation

(i) सहभागी निरीक्षण (Participant Observation)

इस प्रकार के निरीक्षण में निरीक्षणकर्ता स्वयं उस समूह के एक सदस्य के रूप में कार्य करता है, जिस समूह का निरीक्षण करना होता है। समूह की सभी क्रियाओं में वह सक्रिय रूप से भाग लेता है, परिणामस्वरूप निरीक्षणकर्ता उस समूह के सदस्यों के व्यवहार का निरीक्षण सूक्ष्म रूप से कर सकता है

सहभागी निरीक्षण की मुख्य विशेषताएं (Chief Characteristics of Participant Observation) :

सहभागी निरीक्षण में निम्न विशेषताएं पाई जाती है 




 

(a) प्रत्यक्ष-अध्ययन (Direct Study): स पद्धति द्वारा व्यवहार का प्रत्यक्ष रूप से अध्ययन करने के कारण इस प्रविधि द्वारा प्राप्त तथ्यों में विश्वसनीयता व वैधता पाई जाती है। (b) वास्तविक व्यहवार का अध्ययन (Study of Actual Behaviour) : निरीक्षणकर्ता समूहों के सदस्यों के साथ 

मिलकर उनका निरीक्षण करता है, इससे वह नके वास्तविक व्यहार का अध्ययसूक्ष्म करता है, इससे वह उनके वास्तविक व्यवहार का अध्ययन सूक्ष्म रूप से कर पाता है। सुविधापूर्वक निरीक्षण (Easy Observation) : सहभागी निरीक्षण में निरीक्षणकर्ता स्वयं भी समूह में शामिल होता है, अतः समूह के सदस्यों को उस पर विश्वास होता है, परिणामस्वरूप निरीक्षणकर्ता को निरीक्षण करने में सुविधा होती 

(a) संग्रहीत सूचनाओं की परीक्षा संभव (Examination of Collective Information is Possible) : सहभागी निरीक्षण के द्वारा एकत्रित तथ्यों या सूचनाओं की वैधता की जांच निरीक्षणकर्ता आसानी से कर सकता है। (e) निरीक्षणकर्ता की कुशलता में वृद्धि (Increase in Intelligence of the Observation) : निरीक्षणकर्ता चूंकि दसरे समूह के सदस्यों के साथ-साथ रहता है, अत: वह उनकी क्रियाओं व आदतों आदि से परिचित हो जाता है, परिणामस्वरूप उसकी बुद्धि इतनी तीव्र हो जाती है कि वह प्रत्येक परिवर्तन को तुरंत समझ लेता है। सहभागी निरीक्षण की परिसीमाएं या कमियां (Limitation of Participant Observation) सहभागी निरीक्षण की मुख्य परिसीमाएं निम्न प्रकार से हैं

(a) पूर्ण सहभागिता का अभाव (Full Participation is not Possible) : अनेक निरीक्षणकर्ताओं का मत है कि इस प्रकार के निरीक्षण में कभी कभी पूर्ण सहभागिता का अभाव हो जाता है क्योंकि निरीक्षणकर्ता अपनी भिन्नताओं के कारण समूह के सदस्यों के समान नहीं हो पाता।

(b) समूह के व्यवहार में परिवर्तन (Change in Group Behaviour) : जब निरीक्षणकर्ता समूह में अपना एक स्थान निश्चित कर लेता है, तो समूह के साधारण सदस्य भी अपने व्यवहार में परिवर्तन कर लेते हैं।

(c) अधिक व्ययी (More Expensive) : इस प्रकार की विधि में अधिक समय व धन खर्च होता है।

(d) सूक्ष्म-परीक्षण में बाधक (Difficulty in Minute Observation) : निरीक्षणकर्ता का अध्ययन समह की कियाओं से घनिष्ट संबंध उसे सूक्ष्म परीक्षण करने में कभी-कभी बाधक सिद्ध होता है। निरीक्षणकर्ता समूह की अनेक क्रियाओं को ऐसे ही सामान्य समझ कर छोड़ देते हैं। जबकि वह समूह में अपरिचित के रूप में जाता है तो उसके लिए प्रत्येक क्रिया नवीन व आकर्षक होती है। परिणामस्वरूप निरीक्षण सूक्ष्म व विस्तृत हो जाता है।

(e) विशिष्ट समूह का अध्ययन संभव नहीं (Study of Specific Groups is not Possible) : ऐसे अनेक विशिष्ट समूह होते हैं जहां इस प्रकार का निरीक्षण असंभव है। जैसे-अपराधियों के अध्ययन में निरीक्षणकर्ता स्वयं अपराधी बनकर अपराध नहीं कर सकता।

(ii) असहभागी निरीक्षण (Non-Participant Observation)

असहभागी निरीक्षण में निरीक्षणकर्ता समूह के बाहर रहकर समूह के सदस्यों के व्यवहार का निरीक्षण करता है। वह समूह की क्रियाओं में सक्रिय रूप से भाग नहीं लेता बल्कि बाहर से ही उनके व्यवहार को नोट करता रहता है। 

असहभागी निरीक्षण की मुख्य विशेषताएं (Chief Characteristics of Non-participant Observation) : इस प्रकार के निरीक्षण के मुख्य लाभ या विशेषताएं निम्नलिखित हैं (a) पक्षपात का अभाव (Lack of Prejudice) : निरीक्षणकर्ता का समूहों के कार्यों में भाग नहीं लेने के कारण निरीक्षण 

में पक्षपात की संभावना नहीं होती। (b) विश्वसनीय सूचनाओं का संकलन (Collection of Reliable Information) : निरीक्षणकर्ता को इस प्रकार के 

निरीक्षण में अधिक समय मिलने के कारण निरीक्षण अपेक्षाकृत विश्वसनीय एवं निष्पक्ष होता है। (c) अल्प समय व धन (Less Time and Moles: इस प्रकार के निरीक्षण में अपेक्षाकृत विश्वसनीय एवं निष्पक्ष होता 

(a) बाह्य पक्षों का अध्ययन सम्भव (Possibility for study of the External Aspect) : इस पद्धति में 

निरीक्षणकर्ता को सहभागी निरीक्षण पद्धति के समान सूक्ष्म एवं आंतरिक तथ्यों के अध्ययन का अवसर प्राप्त नहीं होता, 

तः वह केवल समस्या से संबंधित व्यक्ति की घटनाओं या क्रियाओं के बाह्य पक्ष का ही अध्ययन कर पाता है। 

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CHILD DEVELOPMENT NOTES FOR CTET/UPTET/UGC NET



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