Tuesday, 12 November, 2019

SANSKRIT PEDAGOGY NOTES IN PDF FOR CTET/UPTET/SUPER TET

SANSKRIT PEDAGOGY FOR CTETUPTETSUPER TET

SANSKRIT PEDAGOGY NOTES IN PDF FOR CTET/UPTET/SUPER TET

मदान एकेडमी

 



गद्य शिक्षण –

गद्य का सर्वप्रथम वर्णन यजुर्वेद में मिलता है। (गद्यात्मकोः यजुः)

गद्य की परिभाषा-जो छन्द से रहित विधा हो गद्य कहलाती है।

वृतबन्धोज्झितं गद्यम्’ -विश्वनाथ -‘अपाद्यबन्धरचना गद्यम्’- दण्डी

गद्य कविनां निकषं वदति-गद्य को कवियों की कसौटी कहा गया है। 

गद्य शिक्षण का मुख्य उद्देश्य-शब्द भण्डार में वृद्धि या शब्दोंच्चारण । 

गद्य शिक्षण में प्रश्नों का सर्वश्रेष्ठ प्रकार- विचार विश्लेषणात्मक प्रश्न

गद्य दो प्रकार का होता है- 1. कथा 2. आख्यायिका 

1. कथा – अवन्तिसुन्दरी कथा 

2. आख्यायिका – हर्षचरितम् -, गद्य शिक्षण में वाचन का सर्वश्रेष्ठ प्रकार- आदर्श वाचन

गद्य शिक्षण की सर्वश्रेष्ठ विधि – काठिन्य निवारण विधि 

काठिन्य निवारण को गद्य शिक्षण की आत्मा कहते है। 

. गद्य शिक्षण की विधियाँ -3

(1) उद्बोधन विधि (2) टीका विधि (3) स्पष्टीकरण विधि 

(1) उद्बोधन विधि- इस विधि का मुख्य उद्देश्य ज्ञानेन्द्रियों को प्रेरित करना है। 

इस विधि को पढ़ाने के लिए प्रत्यक्ष विधि, प्रतिकृति, चित्र, अभिनय आदि साधन काम मे लाये जाते है।

छात्रों के माध्यम से अर्थ निकलवाना उद्बोधन है।

(2) टीका विधि- इस विधि को प्रवचन विधि भी कहते है। 

 



यह विधि उच्च स्तर व उच्चमाध्यमिक स्तर के लिए उपयोगी है।

इस विधि में शब्द की व्युत्पत्ति-संधि,समास,कारक,प्रकृति,विलोम आदि 

को समन्वित करके पढ़ाया जाता है।

यह समन्वित विधि का रूप है। 

(3)स्पष्टीकरण विधि- इस विधि में तुलना, वाक्य प्रयोग, अन्तःकरण, प्रसंग, संदर्भ, व्याख्या आदि शब्दों का प्रयोग किया है।

समास की बहुलता किस शिक्षण में पाई जाती है-गद्य शिक्षण में 

गद्य के चार भेद है- (समास के आधार पर)

१.उत्कालिक गद्य (सर्वाधिक समास में पाये जाते है)

2. चूर्णक गद्य (अल्प समास युक्त गद्य)

3. मुक्तक गद्य (समास रहित गद्य)

4. वृतगन्धि गद्य (ऐसा गद्य का प्रकार जो लय के अनुसार पढ़ाया जाए) 

 

पद्य शिक्षण/काव्य शिक्षण –

पद्य का सर्वप्रथम दर्शन ऋग्वेद में मिलता है। (पद्यात्मकोःऋग्वेदः)

पद्य की परिभाषा-जो छन्द से युक्त विधा हो पद्य कहलाती है।

वाक्यरसात्मकं काव्यम्’ –विश्वनाथ आनन्द

सर्वप्रथम सम्पूर्ण पद्य से युक्त वेद- सामवेद 

* मन्त्रों का वेद – ऋग्वेद

* संगीत का वेद – सामवेद

* जादू टोने का वेद – अथर्ववेद 

* गद्य व पद्य से मिश्रित वेद – यजुर्वेद 




 

काव्य शिक्षण का मुख्य उद्देश्य –

रसानुभूति, काव्य का रसास्वादन, सौन्दर्यानुभूति, भवानुभूति, चतुर्वर्ग फलप्रप्ति का उद्देश्य । 

 पद्य शिक्षण का सर्वश्रेष्ठ वाचन – सस्वर वाचन

पद्य शिक्षण में सर्वश्रेष्ठ प्रश्नों का प्रकार -भावबोध या भाव विश्लेषण 

पद्य शिक्षण की सर्वश्रेष्ठ विधि – दण्डान्वय,खण्डान्वय विधि, काठिन्य निवारण विधि

 

पद्य शिक्षण की विधियाँ -8

(1) गीत विधि

(2) भाषानुवाद विधि

(3) व्याख्या विधि

(4) भाष्य विधि

(5)तुलना विधि

(6) समीक्षा विधि

(7)दण्डान्वय विधि

(8) खण्डान्वय विधि 

 

(1) गीत विधि- प्राथमिक स्तर के लिए श्रेष्ठ है। – इसमें पद्यांश को लयबद्ध या संगीत के माध्यम से पढ़ाया जाता है। 

(2) भाषानुवाद विधि- अर्थबोधन विधि – इस विधि के द्वारा पद्यांश के शब्दों का अर्थ किया जाता है। 

(3) व्याख्या विधि- शंका समाधान के लिए काम में आती है। – इस विधि में एक-एक शब्द की व्याख्या की जाती है बाद में श्लोक का अर्थ करवाया जाता है। इस विधि में व्यंग्यार्थ, लक्ष्यार्थ एवं दार्शनिक पक्ष पर बल दिया जाता है। 

(4) भाष्य विधि- उच्च स्तर के लिए श्रेष्ठ है। — इस विधि में कथा के समान दृष्टान्तों का स्पष्ट अध्यापन कराया जाता है। ऐतिहासिक उदाहरणों की प्रधानता है।

(5) तुलना विधि-प्रस्तुत श्लोक के भाव वाले समान श्लोक को बताया जाता है। इस विधि में काव्य सौन्दर्य की अनुभूति प्राप्त होती है। 

(6) समीक्षा विधि- काव्य की भाषा के साथ-साथ भाषाशैली, छन्द, अंलकार, कथा आदि को दूसरे कवियों की भाषागत विशेषता से तुलना की जाती है। -, इस विधि में गुणदोषों का विवेचन किया जाता है। 

(7) दण्डान्वय विधि- दण्ड का अर्थ होता है “वाक्य’ – वाक्य का अर्थ- वाक्य का अन्वय करना है। -> काव्यशिक्षण में अन्वय का विशेष महत्व है। – सम्पूर्ण श्लोक का पूर्ण वाक्य में परिवर्तन करना दण्डान्वय विधि कहलाता है। → इस विधि में छात्र स्वयं ही शिक्षक की सहायता से श्लोक के प्रधान अंशो को खोजता हैं तथा बाद में कर्ता, कर्म, किया आदि व्याकरण सम्बद्धित प्रश्नों की खोज करता है। – इसमें छात्र निष्क्रिय तथा कक्षा अनुशासनहीन रहेगी। – यह विधि अमनोवैज्ञानिक है। 

(8) खण्डान्वय विधि-इसमें सर्वप्रथम प्रधान वाक्य ढूँढा जाता है। – इसमें व्याकरण संबद्धि प्रश्नों के स्थान पर पाठ्यविषय संबद्धि प्रश्न पूछे जाता है। 




व्याकरण शिक्षण

व्याकरण की व्युत्पत्ति – वि + आ + कृ + ल्युट्

पतञ्जली ने व्याकरण को शब्दानुशासन की संज्ञा दी है।

व्याकरण को भाषा का प्राण तत्व कहते है।

व्याकरण को शब्द की शुद्धि व अशुद्धि का शास्त्र कहते है। 

व्याकरण शिक्षण का उद्देश्य शब्दों की शुद्धि व अशुद्धि का ज्ञान है। 

व्याकरण शिक्षण की सर्वश्रेष्ठ विधि- आगमन निगमन विधि है।

व्याकरण शिक्षण का महत्वपूर्ण सोपान-नियमितिकरण ( नियम से पढ़ना है।)

व्याकरण शिक्षण के 5 सोपान है- “रक्षोहागमलघ्वसन्देहाः’

1. रक्षा 2. ऊह 3. आगम 4. लघु 5. असन्देह 

 

 संस्कृत में कूल 18 सोपान है

व्याकरण शिक्षण की विधियाँ – 8

5 व्याकरण शिक्षण की 2 विधियाँ – प्राचीन, अर्वाचीन प्राचीन विधियाँ- 1. परम्परागत विधि 2. कण्ठस्थीकरण विधि 3.पारायण विधि 4. वाद विवाद विधि 5. व्याख्या विधि 6. भाषा संसर्ग विधि 7. आगमन विधि 8. निगमन विधि ( जो महत्वपूर्ण है वे ही लिखी है।) 

“व्याकरण स्मृतं मुखम्”

1. परम्परागत विधि- इस विधि के अन्तर्गत गुरूकुल पद्धत्ति द्वारा व्याकरण शिक्षण का अध्ययन करवाया जाता था। इस विधि में पतञ्जली के आगमन निगमन विधि के आधार पर अध्ययन करवाया जाता था। इस विधि में अष्टाध्यायी के सूत्रों को कण्ठस्थीकरण करवाया जाता था। इस विधि में कण्ठस्थीकरण पर बल दिया जाता था न कि अर्थबोधन पर। पतञ्जली ने प्रकृति प्रत्यय पर विशेष बल दिया।

2.आगमन विधि – प्रवर्तक- पतञ्जली – यह व्यक्तिगत अन्वेक्षण विधि है। – सोपान 4 हैं – उदाहरणों से नियमों की ओर

1. उदाहरण- विशिष्ट से सामान्य की ओर

2. निरीक्षण- ज्ञात से अज्ञात सकी ओर

3. नियमितिकरण- सरल से कठिन की ओर

4. परीक्षण- स्थूल से सुक्ष्म की ओर 

यह विधि रोचक है-नूतन नियम से सामान्य ज्ञान की ओर।

छात्र सक्रिय रहते है व कक्षा अनुशासित रहती है। 

 

3. निगमन विधि – प्रवर्तक- पतञ्जली -, सोपान 4 हैं – नियमों से उदाहरणों की ओर

1. नियमबोधन – अज्ञात से ज्ञात की ओर

2. नियमस्पष्टीकरण – कठिन से सरल की ओर

3. नियमपरीक्षण- सुक्ष्म से स्थूल की ओर

4. नियम सत्यापन – नियम से उदाहरण की ओर सामान्य से विशिष्ट की ओर  छात्र निष्कीय रहते है व कक्षा अनुशासनहीन रहती है। 

 

4. भाषा संसर्ग विधि- इस विधि के अन्तर्गत व्याकरण तथा अनुकरण के माध्यम से अध्यापन कराया जाता है। 

5. समवाय/सहयोग विधि- इस विधि के अन्तर्गत व्याकरण का ज्ञान अलग से न देकर गद्य-पद्य रचना, नाटक, कथा के अध्ययन के साथ साथ दिया जाता हैं। 

है 

6. ह्ययूरिस्टिक विधि- प्रवर्तक- आर्मस्ट्रांग –

इस विधि को अन्वेक्षण विधि के नाम से भी जाना जाता है। 

इस विधि में बालक स्वयं शब्दों की खोज करता है।

यह विधि “सिखो” नामक सिद्धान्त पर काम करती है।

7. अन्वयव्यतिरेक विधि- इस विधि में काव्य शिक्षण के अन्वय को आधार मानकर प्रत्येक शब्द का व्याकरण दृष्टि से टुकडे(खण्ड) करके व्याकरण शिक्षण करवाया जाता है। 

 
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sanskrit pedagogy part 7



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