Tuesday, 12 November, 2019

SANSKRIT PEDAGOGY NOTES FOR CTET

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भाषा की परिभाषा 

डॉ० बाबूराम सक्सेना के अनुसार “जिन ध्वनि-चिह्नों द्वारा मनुष्य परस्पर विचार-विनिमय करता है, उनको समष्टि रूप से ‘भाषा’ कहते हैं।” क्रोचे के अनुसार “भाषा उस स्पष्ट, सीमित तथा सुगठित ध्वनि को कहते हैं, 

 ए० एच० गार्डिनर के अनुसार “विचार की अभिव्यक्ति के लिए व्यक्त ध्वनि संकेतों के व्यवहार को भाषा कहते हैं।” भारतीय भाषा विज्ञान के अनुसार “विभिन्न अर्थों में संकेतित शब्द समूह ही भाषा है, जिसके द्वारा हम अपने विचार या मनोभाव दूसरों के प्रति बहुत सरलता से प्रकट करते हैं।” 

 भाषा का उदभव भाषा की उत्पत्ति के प्रश्न का सम्बन्ध मनुष्य की बोल पाने की शक्ति से न होकर यह है कि मनुष्य ने अपने द्वारा उच्चरित ध्वनियों का सम्बन्ध विभिन्न : वस्तुओं से सर्वप्रथम कब स्थापित किया ? अर्थात् इन ध्वनियों का संकेत इस पदार्थ में होगा या इस पदार्थ का यह अर्थ होगा। 

मानव ने यह निश्चय इतिहास के किस काल में किया ? क्योंकि मनुष्य द्वारा भाषा का उद्भव उसी रूप में सम्भावित है, अन्यथा अन्य पशु-पक्षियों की । भाँति केवल ध्वनि उत्पन्न करने की शक्ति तो उसमें भी जन्म से ही रही होगी। 

वास्तव में देखा जाए तो ‘भाषा’ की उत्पत्ति (उद्भव) का विचार ही भाषा विज्ञान के विषय-क्षेत्र के अन्तर्गत नहीं आता है। कारण, किसी भी विज्ञान की भाँति भाषा विज्ञान का कार्य भी प्रस्तुत सामग्री का विवेचन-विश्लेषण ही होता है। । उसका कार्य केवल प्रस्तुत या प्रत्यक्ष विषय-वस्तु पर विचार करना ही है। भाषा की उत्पत्ति सम्बन्धी जितने भी विचार आज तक व्यक्त किये गए हैं वे । सब के सब अनुमान पर ही आधारित हैं। अनुमान पर आधारित विचार सीधे । दर्शन से ही सम्बन्ध रखते हैं, किसी विज्ञान से नहीं। अतः भाषा के उद्भव का प्रश्न भी सीधे दर्शन मानव-विज्ञान या समाज विज्ञान से जुड़ा हुआ है, भाषा विज्ञान से नहीं। 

‘भाषा के उद्भव पर विचार के दो मार्ग’ 

भाषा के उद्भव पर विचार के लिए विद्वानों ने दो मार्गों का आश्रय लिया 

है-1. प्रत्यक्ष मार्ग 2. परोक्ष मार्ग।

1.प्रत्यक्ष मार्ग 

प्रत्यक्ष मार्ग में भाषा की आदिम अवस्था की ओर से चलकर उसकी आज तक विकसित दशा का विचार किया जाता है। प्रत्यक्ष मार्ग में भाषा के उद्भव तथा विकास से सम्बन्धित निम्न सिद्धान्तों का उल्लेख प्रमुख रूप से किया जाता है 

(क) दैवी सिद्धान्त-इस सिद्धान्त के अनुसार भाषा की उत्पत्ति ईश्वर द्वारा हुई है। अर्थात् ईश्वर ने जब मनुष्य की रचना की थी तभी उसे पूर्णतया विकसित भाषा भी उसने प्रदान कर दी थी। इस सिद्धान्त के अनुसार, प्रत्येक धर्म वालों के द्वारा अपनी भाषा को ही ‘आदिम भाषा’ स्वीकार किया जाता है। वैदिक धर्मावलम्बियों के अनुसार वैदिक  या संस्कृत को, बौद्धों के अनुसार ‘पालि’ को जैनियों के अनुसार अर्धमागधी को, सिखों के अनुसार पंजाबी को, ईसाइयों के अनुसार हिब्रू या इब्रानी को तथा मुसलमानों के अनुसार अरबी को ही, जो उनके धार्मिक ग्रन्थों की भाषा है, आदिम भाषा माना जाता है तथा उसी से विश्व की अन्य भाषाओं का उद्भव स्वीकार किया जाता है। 

उपर्युक्त भावना से इस सिद्धान्त का प्रतिपादन प्रायः सभी धर्मों के धार्मिक ग्रन्थों में पाया जाता है। वैदिक धर्मावलम्बियों के अनुसार ऋग्वेद में कहा गया है कि “दैवी वाचमजनयन्त देवाः तां विश्वरूपाः पशवो वदन्ति।” अर्थात् देवों ने वाणी को उत्पन्न किया तथा सब प्राणी उसको ही बोलते हैं। 

(ख) संकेत सिद्धान्त-इस सिद्धान्त को निर्णय सिद्धान्त के नाम से भी जाना जाता है। इस सिद्धान्त के सर्वप्रथम प्रतिपादक फ्रांसीसी विचारक ‘रूसो’ (Rousseau) हैं। 

संकेत सिद्धान्त के अनुसार, आदिम मानव अपने मनोभावों को आंगिक संकेतों के द्वारा व्यक्त किया करता था, किन्तु बाद में कठिनाई उपस्थित होने पर सामाजिक समझौते के आधार पर उसने विभिन्न भावों, विचारों तथा पदार्थों के लिए विभिन्न ध्वन्यात्मक संकेत निश्चित कर लिए यह कार्य सभी मनुष्यों ने किसी स्थान पर एकत्र होकर पारस्परिक विचार-विनिमय द्वारा किया और इस प्रकार सामाजिक पृष्ठभूमि में सांकेतिक संस्थान द्वारा भाषा का उद्भव हुआ। 

भाषा का विकास जब विश्व और उसकी प्रत्येक वस्तु ही परिवर्तनशील है, तब भाषा भी अपरिवर्तित कैसे रह सकती है? कुछ विद्वान भाषा की इस परिवर्तनशीलता को भाषा का विकास कहना उपयुक्त मानते हैं। 

भाषा के विकास के अर्थात् परिवर्तन के निम्नलिखित दो कारण हैं 

1. आन्तरिक या आभ्यन्तर कारण 2. बाह्य कारण 

– 1. आन्तरिक या आभ्यन्तर कारण 

ये कारण वे होते हैं, जो किसी भाषा को बोलने वाले व्यक्तियों में ही रहते । हैं। ये कारण प्रायः व्यक्ति के उच्चारण-अवयवों, श्रवण-अवयवों तथा इनके साथ सहयोग करने वाले व्यक्ति के मस्तिष्क आदि से सम्बन्ध रखते हैं, जैसे 

(क) अनुकरण की अपूर्णता । (ख) प्रयत्न लाघव (ग) मात्रा-सुर-बलाघात (घ) भावावेश (ङ) सादृश्य या मिथ्या सादृश्य आदि 

– 2. बाह्य कारण 

ये वे कारण हैं, जो किसी भाषा को बोलने वाले व्यक्ति के चारों ओर विद्यमान वातावरण या परिवेश से सम्बन्ध रखते हैं तथा जिनसे भाषा अनजाने ही प्रभावित होती रहती है, जैसे 

(क) भौगोलिक प्रभव (ख) ऐतिहासिक प्रभाव (ग) सांस्कृतिक प्रभाव | 

(घ) सामाजिक प्रभाव (ङ) वैयक्तिक प्रभाव (च) जाति प्रभाव (छ) साहित्यिक प्रभाव (ज) वैज्ञानिक प्रभाव 

ध्वनि भाषा का प्रारम्भ ध्वनि से ही होता है। ध्वनि के अभाव में भाषा की कल्पना भी नहीं की जा सकती क्योंकि ध्वनि चिह्नों की समष्टि को ही ‘भाषा’ कहते हैं। यह ध्वनि वाक्-इन्द्रिय से उत्पन्न होती है तथा मुखविवर से होती हुई वायु तरंग के द्वारा श्रोता के कर्णविवर तक पहुँचती है। उत्पादन, संवहन तथा ग्रहण भेद से ध्वनि के तीन पक्ष हैं। इनमें से उत्पादन और ग्रहण का सम्बन्ध शरीर से है तथा संवहन का सम्बन्ध वायु तरंगों से है। 

ध्वनि परिवर्तन 

भाषा विज्ञान में ध्वनि विज्ञान का महत्वपूर्ण स्थान है। इसका सम्बन्ध भाषा के भौतिक आधार ध्वनि से है। मनुष्य के मुख से निकला शब्द ध्वनियों का विस्तृत अध्ययन ध्वनि विज्ञान में किया जाता है। कान से सुनाई देने वाले 

किसी भी शब्द को ध्वनि कहते हैं। 

संस्कृत भाषा में ‘ध्वनिशब्दे’ धातु से ध्वनि शब्द निर्मित हुआ है। 

ध्वनियाँ दो प्रकार की होती हैं-1. भाषा ध्वनि 2. ध्वनिग्राम। भाषा विज्ञान में । ध्वनि शब्द को सामान्य ध्वनियों से भिन्न बताने के लिए भाषा ध्वनि कहा जाता है। भाषा ध्वनि की परिभाषा करते हुए डॉ० सुनीति कुमार चटर्जी ने लिखा है कि “मानव के ध्वनि यन्त्र द्वारा उत्पादित तथा निश्चित श्रवण गुणों से युक्त ध्वनि को भाषा ध्वनि कहते हैं।” डॉ० भोलानाथ तिवारी ने भाषा ध्वनि की परिभाषा इस प्रकार की है- “भाषा ध्वनि वह ध्वनि है जिसे मनुष्य अपने मुँह के नियत स्थान से निश्चित प्रयत्न द्वारा किसी ध्येय को स्पष्ट करने के लिए उच्चरित करे और श्रोता जिसे उसी अर्थ में ग्रहण करे।”

परिवर्तन की गति का प्रभाव संसार की सब भाषाओं पर भी पड़ता है। 

भाषाओं का जो रूप आज से हजारों वर्ष पूर्व था वह अब नहीं है। संसार की प्राचीन भाषाएँ संस्कृत, ग्रीक, लैटिन के रूप परिवर्तन होने से बाद में अनेक भाषाओं का जन्म हुआ जिनमें अधिकांश वर्तमान समय में विभिन्न क्षेत्रों में बोली जाती हैं। भाषा में होने वाले इस परिवर्तन को विद्वान ‘विकार’ या ‘विकास’ के नाम से अभिहित करते हैं। भाषा के विभिन्न अंगों-ध्वनि, रूप, वाक्य और अर्थ में ध्वनि का महत्वपूर्ण स्थान है। भाषा में यह परिवर्तन कई प्रकार से होता है-ध्वनि में, रूप में या अर्थ में। कभी-कभी सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में कुछ ध्वनियों का प्रयोग कम हो जाता है। धीरे-धीरे लुप्त भी हो जाता है। कुछ नवीन ध्वनियों का समावेश हो जाता है। उच्चारण सम्बन्धी अन्तर होने से भी परिवर्तन हो जाता है। कभी-कभी सामाजिक, राजनीतिक, धार्मिक, भौगोलिक कारणों से भी “.षा में ध्वनि सम्बन्धी परिवर्तन होते रहते हैं। 

ध्वनि परिवर्तन के कारण 

 




 

ध्वनि परिवर्तन के निम्नलिखित दो कारण हैं 

– 1. आभ्यन्तर कारण 

जब ध्वनि-उच्चारण करने वाले प्रभाव से ध्वनियों में अन्तर उत्पन्न हो जाता है, तो उन्हें आभ्यन्तर कारण कहते हैं। ध्वनि परिवर्तन करने वाले प्रमुख आभ्यन्तर कारण निम्नलिखित हैं 

 

 (क)मुख-सुख-यह आभ्यन्तर कारणों में प्रमुख कारण है। भाषण करते समय वक्ता ध्वनियों का उच्चारण अपनी सुविधा से करता है। बोलते समय वह । चाहता है कि अल्प प्रयत्न से कम उच्चारण करके अपना अभिप्राय श्रोता पर प्रकट कर दे। 

परिणामतः मध्यस्थ ध्वनियाँ लुप्त हो जाती हैं। इसी मुख-सुख के लिए । संस्कृत में सन्धियों का विधान है। इसी मुख-सुख के लिए संस्कृत में सन्धियों का । विधान है। इसी मुख-सुख के लिए अंग्रेजी में NIGHT, TALK, WALK आदि शब्दों में G, H एवं L आदि का उच्चारण होता है। 

हिन्दी में स्कूल > सकूल या इस्कूल, स्टूल >सटूल या इस्टूल, लक्ष्मण > लखन आदि प्रयोग मिलते हैं। .. 

(ख)शब्दों की लम्बाई-शब्दों की अधिक लम्बाई के कारण भी ध्वनि में परिवर्तन हो जाता है। जो शब्द अधिक लम्बे होते हैं उन्हें बोलने में असुविधा होती | है। अत: उनमें परिवर्तन अधिक होता है। ।

(ग) स्थिति के कारण-संयुक्त व्यञ्जनों में दोनों व्यञ्जन समान शक्ति के हैं, तो प्रथम निर्बल होता है तथा दूसरा सबल। अर्थात् सबल ध्वनि । निर्बल ध्वनि को अपने वशीभूत कर लेती है या अपने अनुसार परिवर्तन कर लेती है; जैसे अग्नि > अग्गि दुग्ध > दूध

(घ) क्षिप्र भाषा-बोलने की शीघ्रता के कारण भी ध्वनि में परिवर्तन आ जाता है। जब किसी भाषा को धीरे-धीरे प्रत्येक शब्द का ठीक-ठीक उच्चारण करते हुए बोला जाता है, तो उसका जो स्वरूप रहता है वह क्षिप्र भाषण में नहीं 

रहता। जैसे साहित्य में लिखा जाता है ‘पण्डित जी’ लेकिन शीघ्रता के कारण : सर्वत्र उच्चारण ‘पण्डी जी’ होता है, यथा 

इसने > इन्ने उन्होंने > उन्ने जिन्होंने > जिन्ने

(ङ) अज्ञान-अज्ञानता के कारण भी ध्वनि में परिवर्तन होता रहता । है। देशी या विदेशी शब्दों का अज्ञानता के कारण प्राय: अशुद्ध उच्चारण करते नासिवर यूनीवर्सिटी > यूनीवस्टी ओवरसीयर > ओसियर

(च) अनुकरण की अपूर्णता-भाषा अनुकरण से सीखी जाती है। जब … कोई व्यक्ति किसी ध्वनि का उच्चारण करता है, तो दूसरा व्यक्ति उसका अनुकरण करके सीख लेता है। लेकिन अनुकरण में त्रुटियाँ रह जाती हैं। इस अनुकरण अपूर्ण रह जाता है। 

ध्वनियों में प__उपाध्याय > झा, रोटी > लोटी, रुपया > लुपया (

छ) यदृच्छा शब्द-बोलते समय व्यक्ति अपने आप शब्द बनाकर बोलते हैं, उन्हें यदृच्छा शब्द कहते हैं। कभी-कभी एक शब्द की समानता पर निरर्थक शब्द जोड़कर जोड़ा प्रचलन में आ जाता है, जैसे रिवर्तन आता रहता है। जिसका समाज में धीरे-धीरे प्रचलन हो जाता है; जैसे खाना-वाना, गाना-वाना, लिखना-विखना, पानी-वानी आदि।

 



 

2. बाह्य कारण 

(क) भौगोलिक प्रभाव-भौगोलिक प्रभाव के कारण ध्वनियों में परिवर्तन हो जाता है। अधिक ठण्डे स्थानों में व्यक्ति अधिक मुख नहीं खोल सकता है। अत: विवृत ध्वनियों का विकास नहीं हो पाता है। गरम देश में इसके विपरीत विवृत ध्वनियों का अधिक विकास होता है। पर्वतीय क्षेत्रों के निवासी बाहरी सम्पर्क में कम आते हैं, अत: उनका मानसिक, सामाजिक धार्मिक विकास धीमा रहता है। 

(ख) लेखन का प्रभाव-लिखने के द्वारा भी ध्वनि परिवर्तन होते रहते हैं।

अंग्रेजी के प्रभाव से हिन्दी के मिश्र, गुप्त, मित्र, अशोक, राम जैसे शब्द मिश्रा, गुप्ता, रामा आदि के रूप में उच्चारित होते हैं। उर्दू के प्रभाव से महेन्द्र का महेन्दर, स्टूल का सटूल उच्चारण किया जाता है। 

(ग) काल का प्रभाव-ध्वनि विकास में समय का भी प्रभाव पड़ता है। भारत की वैदिक ध्वनियों और आज की आर्यभाषीय हिन्दी की ध्वनियों में अन्तर मिलता है। द्रविड़ों के कारण आर्यभाषा में मूर्धन्य ध्वनियों का प्रचार हो गया है और आज भी उनका प्रयोग हो रहा है, यथा देवास: > देवाः, मास: >माः, देवेभिः >देवैः ।

(घ) सादृश्य-ध्वनि परिवर्तन का महत्वपूर्ण कारण सादृश्य है। किसी एक ध्वनि के आधार पर दूसरी ध्वनि में भी समानता या एकरूपता लाई जाती है, जैसे-स्वर्ग के सादृश्य पर नरक > नर्क हो गया। द्वादश के सादृश्य पर ‘एकदश’ : का एकादश बन गया। 

(ङ) आत्मप्रदर्शन-इसके कारण भी व्यक्ति बोलते समय ध्वनि परिवर्तन कर लेते हैं, जैसे-खालिस (शुद्ध), निखालिस (अशुद्ध) छात्र >क्षात्र, सेवक > शेवक, इच्छा > इक्षा, क्षत्रिय > छत्रिय बोलते हैं। अर्थ परिवर्तन की दशाएँ भाषा में अर्थ का महत्वपूर्ण स्थान है। भाषा शरीर का निर्माण यदि शब्दों से होता है, तो उस शरीर में अर्थ आत्मा की भूमिका का निर्वाह करता है। 

शब्द और अर्थ के सम्बन्ध को नितान्त अपरिहार्य महत्व के कारण ही । कालिदास एवं तुलसीदास ने अपने-अपने शब्दों में व्यक्त किया है। यदि अर्थ । रहित शब्दों का उच्चारण किया जाए तो वह तथ्यहीन होगा। . 

अर्थ की परिभाषा प्रस्तुत करते हुए वाक्यपदीयकार ने कहा है कि-“जिस । शब्द के उच्चारण से जब जिस अर्थ की प्रतीति होती है, वही उसका अर्थ है। अर्थ का अन्य कोई लक्षण नहीं हो सकता।” 

प्रत्येक शब्द का अर्थ होता है लेकिन वह हमेशा एक नहीं रहता। जैसे—पहले महाराज शब्द राजा के लिए प्रयुक्त होता था, लेकिन उसके बाद इस । शब्द का प्रयोग रसोइया के रूप में प्रचलित हो गया। .

 

1. अर्थ विस्तार 

अर्थ विस्तार से आशय है अर्थ का सीमित क्षेत्र से निकल विस्तार पा जाना। । अर्थ विस्तार में शब्दों का अर्थ अपने मौलिक अर्थ के रहते हुए, अपने सीमित क्षेत्र । का अतिक्रमण कर व्यापक अर्थ को सूचित करने लगता है, जैसे तेल-ऋग्वेद काल में तेल का अर्थ था तिल से निकला द्रव पदार्थ अर्थात् । संस्कृत में तिल के रस को तेल कहते थे। अब तेल शब्द का प्रयोग सभी चीजों के । तेल के लिए होता है। तिल, सरसों, नारियल, अलसी, मूंगफली, अरण्डी, ! बिनौला, मछली का तेल, मिट्टी का तेल और तो और यदि किसी मजदूर से अधिक श्रम ले लिया और उससे पसीना बह रहा है, तो वह कहेगा कि आपने तो मेरा तेल निकाल दिया। अत: यहाँ अर्थ विस्तार हो गया अधर-अधर का मूल अर्थ था ओष्ठ। परन्तु वर्तमान में अधर का अर्थ दोनों : ओठों के लिए प्रयुक्त होता है। 

कुशल-प्राचीनकाल में ऋषि-मुनियों के आश्रम में रहने वाले शिष्य जो बिना हाथ-पैर छिदाए ‘कुशा’ लाने के लिए नियुक्त रहते थे उन्हें कुशल कहा जाता था, लेकिन बाद में किसी भी ऐसे व्यक्ति को जो कार्य कुशलतापूर्वक करने वाला हो, ‘कुशल’ कहा जाने लगा। अन्य उदाहरण-महाराज, प्रवीण, गोष्ठ आदि।

2. अर्थ संकोच 

जब कोई शब्द पहले तो विस्तृत अर्थ में प्रयुक्त होता रहा हो, बाद में अर्थ संकोच होने पर किसी विशिष्ट या संकुचित अर्थ में प्रयुक्त होने लगता है। इस सम्बन्ध में ब्रील महोदय का विचार है कि जो जाति या देश जितना विकसित या सभ्य होगा उसकी भाषा में उतना ही अधिक अर्थ संकोच होगा, जैसे ‘मृग’ का मूल अर्थ पशु था। इसलिए शिकार का वाचक ‘मृगया’ शब्द है। | किन्तु आज ‘मृग’ शब्द केवल ‘हिरण’ के अर्थ का वाचक है। इसी प्रकार ‘गो’ शब्द पहले गमन के अर्थ में प्रयुक्त होता था परन्तु आज उसका प्रयोग केवल ‘गाय’ के लिए किया जाता है। सर्प, वृक, वेदना, वेद, वर, धान्य आदि भी अर्थ संकोच के उदाहरण हैं। -3. अर्थान्तरण एक अर्थ के लोप होने और नवीन अर्थ के आ जाने को अर्थादेश कहते हैं। अर्थादेश में एक अर्थ के स्थान पर या पुराने अर्थ के स्थान पर अन्य या नवीन अर्थ हो जाता है। जैसे—’असुर’ का अर्थ पहले देवताबोधक था। 

ईरान में भी ‘असुर’ शब्द देवता का ही वाचक है। किन्तु निषेधात्मक ‘अ’ के कारण असुर, राक्षस या दैत्य के अर्थ में प्रयुक्त होने लगा है। ‘उपवास’ शब्द का मौलिक अर्थ यजमान का अग्नि के समीप रहना था, लेकिन अब उसका अर्थ भूखा रहना या व्रत से है। 

ऋग्वेदकाल में जो गाय से दूध दुहाती थी, उसे दुहिता कहा जाता था, लेकिन अब बेटी की पुत्री के लिए दुहिता या देवती (धेवती) प्रयुक्त होने लगा है। 

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ENVIRONMENT ONLINE PRACTICE PAPER FOR CTET/UPTET



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