Sunday, 15 December, 2019

Maths Pedagogy PDF Notes in Hindi Free Download

Maths Pedagogy PDF Notes in Hindi Free Download



गणित परिषद

गणित परिषद्, गणित की पाठ्यक्रम सहगामी क्रियाओं की रीढ़ की हड्डी है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि शिक्षण उपलब्धि की दृष्टि से कक्षा से बाहर की गयी वैज्ञानिक क्रियाएं नियमित कक्षा क्रियाओं का मुकाबला करती हैं! अनेक ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं, जिनमें पूर्ववर्ती क्रियाएं अपेक्षाकृत अधिक महत्वपूर्ण सिद्ध हुई है! गणित परिषद में शिक्षा ‘करके सीखना’ पर आधारित होती है, इस कारण यह अधिक रुचिपूर्ण होती है। औपचारिक कक्षा शिक्षण की अपेक्षा यह छात्रों की योग्यता और रुचि के अधिक अनुरूप होती हैं, क्योंकि इसमें किसी प्रकार के निश्चित पठन-पाठन पर अधिक जोर नहीं दिया जाता। इस कारण यहां छात्रों की सृजनात्मक शक्ति का अधिक विकास होता है। 

गणित परिषद के उद्देश्य(Maths Pedagogy)

1. छात्रों की समस्या समाधान विधि के आधार पर गणित संबंधी अभिरुचि विकसित करना।

2. छात्रों का दैनिक जीवन के प्रति व्यापक दृष्टिकोण विकसित करना

3. गणित को रोचक कार्य रूप में प्रोत्साहित करना।

4. छात्रों में परस्र सहयोग एवं स्वस्थ प्रतियोगिता विकिसत करना।

5. अन्वेषणात्मक, रचनात्मक एवं आविष्कारात्मक योग्यताओं को विकसित करना।

6. छात्रों को विज्ञान की नवीनतम प्रगति एवं उसके दैनिक जीवन में उपयोग से परिचित करना।

7. छात्रों में तर्क व निरीक्षण शक्ति विकसित करना।

8. दूसरी विज्ञान परिषदों से सम्पर्क स्थापित करना और उनके साथ सूचनाओं और क्रियाओं का विनिमय करना।

9. जिला, प्रदेशीय, राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्तर की परिषदों की सदस्यता प्राप्त करना। 



 

शिक्षा के मूल्यांकन के प्रमुख उद्देश्य

(Maths Pedagogy)

  • पाठ्यक्रम में आवश्यक संशोधन करना। 
  • परीक्षा प्रणाली में सुधार करना। 
  • निर्देशन एवं परामर्श (Guidance and Counselling) हेतु उचित अवसर प्रदान करना। 
  • अध्यापकों की कार्यकुशलता एवं सफलता का मापन करना। 
  • बालकों के व्यवहार-सम्बन्धी परिवर्तनों की जांच करना। 
  • बालकों की दुर्बलताओं (Weaknesses) तथा योग्यताओं की जानकारी प्रदान करने में सहायता देना। नवीनतम एवं प्रभावी शिक्षण विधियों एवं प्रविधियों की खोज करना। 
  • अनुदेशन (Instruction) की प्रभावशीलता का पता लगाना! । 
  • प्रचलित शिक्षण विधियों तथा पाठ्य-पुस्तकों की आंच करके उनमें अपेक्षित सुधार करना। 
  • बालकों को उत्तम ढंग से सीखने के लिए प्रोत्साहित करना। 
  • बालकों की व्यक्तिगत एवं सामाजिक आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु जानकारी प्रदान करना। 
  • शिक्षण व्यूह रचना (Teaching Strategy) में सुधार एवं विकास करना। 
  • निदानात्मक (Diagonestic) तथा उपचारात्मक (Remedial) शिक्षा पर बल देना। 




 

मूल्यांकन की आवश्यकता एवं महत्व

(Maths Pedagogy)

मूल्यांकन की आवश्यकता एवं महत्व को निम्न बिन्दुओं की सहायता से स्पष्ट किया जा सकता है 

  • मूल्यांकन के द्वारा बालकों की मानसिक शक्ति, रुचि तथा उनके दृष्टिकोण का अनुमान लगाया जा सकता है। 
  • योग्यतानुसार बालकों को विभिन्न समूहों में विभाजित करने के लिए आवश्यक हैं। 
  • छात्रों को व्यावसायिक एवं शैक्षिक निर्देशन देने के लिए आवश्यक हैं। 
  • उसके द्वारा अधिकगम-प्रक्रिया में सुधार होता है। 
  • पाठ्यक्रम, पाठ्य-पुस्तक एवं शिक्षण-विधियों में सुधार करने हेतु अत्यन्त आवश्यक है! 
  • इसके द्वारा छात्रों को अपनी कमजोर तथा मजबूत स्थिति का पता लगता है। 
  • बालकों की कक्षोन्नति और कक्षा विभाजन में सुविधा प्रदान करता है। 
  • परीक्षा प्रणाली में आवश्यक सुधार होता है।

 

गणित : मूल्यांकन की प्रविधियां (Evaluation Techniques)

(Maths Pedagogy)

मूल्यांकन प्रविधियों की उपयुक्तता इस बात पर निर्भर करती है कि अध्यापक को बालक के व्यवहार में परिवर्तन के बारे में कितनी स्पष्ट जानकारी मिलती है। उद्देश्यों एवं विषय-वस्तु की प्रकृति को ध्यान में रखकर ही मूल्यांकन की विधि का चयन करना चाहिए। यदि हमने दोषपूर्ण प्रविधि का प्रयोग किया तो निकाले गए निष्कर्ष दोषपूर्ण होंगे तथा हमें छात्र के बारे में गलत जानकारी प्राप्त होगी। प्रत्येक उद्देश्य दूसरे उद्देश्यों से भिन्न होता है तथा उनसे सम्बन्धि त व्यवहार भी भिन्न होते हैं। मूल्यांकन की किसी एक प्रविधि को हम सभी उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए प्रयोग में नहीं ला सकते। कुछ मुख्य मूल्यांकन प्रविधियां निम्नलिखित हैं

1 लिखित परीक्षाएं (Written Examinations) : इन परीक्षाओं में निबन्धात्मक प्रश्न तथा वस्तुनिष्ठ प्रश्न मुख्य हैं। निबन्धात्मक परीक्षाओं में छात्र को विस्तारपूर्वक उत्तर लिखने होते हैं, जबकि वस्तुनिष्ठ परीक्षा में उत्तर लिखने का ढंग अत्यन्त सरल एवं संक्षिप्त होता हैं वस्तुनिष्ठ परीक्षाएं दो प्रकार की होती हैं। पहली, प्रमापित (Standardized) जिनके सामान्य स्तर पहले से ही स्थापित किए होते हैं, दूसरी, अध्यापक निर्मित जिनमें प्रश्नों का निर्माण शिक्षक स्वयं करता है।

2 अभिलेख (Records) : विद्यार्थियों की गणित की पुस्तिका, अभिलेख संचिका (Cumulative Records) इत्यादि के अवलोकन से उनकी रुचि, दृष्टिकोण, अनुभूति इत्यादि का मूल्यांकन किया जा सकता है। कक्षा में तथा घर पर किए गए कार्य की पुस्तिकाओं को भी अभिलेख का अंग माना जा सकता है।

3 मौखिक परीक्षाएं (Oral Examinations): इन परीक्षाओं द्वारा छात्रों की उपलब्धियों (Achievements) के उन पक्षों का मूल्यांकन किया जाता है जिन्हें हम लिखित परीक्षाओं द्वारा नहीं माप सकते। इन परीक्षाओं में मौखिक प्रश्न, मर्श एवं नाट्य-प्रदर्शन आदि सम्मिलित हैं। गणित के मूल्यांकन में मौखिक परीक्षाओं को स्थान दिया जाना चाहिए। लिखित परीक्षाओं की कमियों की पूर्ति किसी सीमा तक मौखिक परीक्षाओं द्वारा सम्भव 

4 निरीक्षण (Observation) : गणित में निरीक्षण द्वारा छात्रों की उपलब्धियों के विषय में साधारण जानकारी मिल सकती है। बालकों की संवेगात्मक स्थिरता, मानसिक परिपक्वता तथा सेचने के तरीकों में यथार्थता की जानकारी कक्षा में प्रतिदिन निरीक्षण द्वारा प्राप्त हो सकती है। विद्यार्थी के व्यवहार में परिवर्तन उसके प्रश्न हल करने की क्रिया के निरीक्षण से भी किया जा सकता है। जब विद्यार्थी प्रश्न हल करता है तो अध्यापक उनका अवलोकन करके यह देख सकता है कि वह शीघ्रता, स्वच्छता एवं शुद्धता से प्रश्नों को हल कर सकता है या नहीं। अवलोकन द्वारा विद्यार्थियों के व्यक्तित्व के अन्य गुणों; जैसे-आत्मविश्वास, चिन्तन, विवेक, कल्पना, तर्क, सूझ, भावात्मक विकास इत्यादि का भी मूल्यांकन किया जा सकता है।

5 प्रयोगात्मक परीक्षाएं (Practical Examinations): गणित में ज्यामिति, त्रिकोणमिति आदि विषयों में अनेक ऐसे उप-विषय होते हैं जिनमें प्रयोगात्मक कार्य द्वारा प्रत्ययों एवं संकल्पनाओं (Concepts and hypotheses) का स्पष्टीकरण कराया जा सकता है। क्षेत्रफल, ऊंचाई एवं दूरी आदि उप-विषयों में प्रयोगात्मक कार्य बहुत उपयोगी हैं। गणित में इन परीक्षाओं को स्थान दिया जाना चाहिए

6 प्रश्नावली (Ouestionnaire): जब अध्यापक समय की कमी के कारण निरीक्षण तथा साक्षात्कार प्रणाली का प्रयोग नहीं कर पाता तो वह प्रश्नावली प्रविधि का प्रयोग करता हैं इसमें विद्यार्थियों को छपी हुई प्रश्नों की सूची दे दी जाती है जिन पर वह अपने उत्तर लिखकर अध्यापक को वापिस कर देते हैं। इस प्रविधि द्वारा विद्यार्थियों की गणित में रुचि, दृष्टिकोण, अनुभूति, व्यक्तित्व के गुण तथा अन्य व्यावहारिक परिवर्तनों का मूल्यांकन हो सकता है।

7 साक्षात्कार (Interview) : साक्षात्कार द्वारा विद्यार्थियों की गणित में रुचि का विकास, उपयुक्त दृष्टिकोण, आत्मविश्वास, बौद्धिक स्तर, गणित के ज्ञान प्रयोग इत्यादि का मूल्यांकन किया जा सकता है। मौखिक परीक्षा तथा साक्षात्कार के उद्देश्यों में अधिक अन्तर नहीं है। 

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SCIENCE NOTES-DIGESTIVE SYSTEM-DIGESTION PROCESS



 

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