Sunday, 15 December, 2019

MATHS PEDAGOGY NOTES FOR CTET/UPTET/HTET/REET

MATHS PEDAGOGY-CTETUPTETCGTETHTET

MATHS PEDAGOGY NOTES FOR CTET/UPTET/HTET/REET



गणित पाठ्यक्रम का निर्माण

किसी भी स्तर का पाठ्यक्रम निर्माण करते समय सामाजिक एवं सास्कृतिक आधार को ध्यान में रखना अनिवार्य होता है। बालकों की मानसिक परिपक्वता, रूचि ग्रहण शक्ति, जिज्ञासा आदि को भी ध्यान में रखना आवश्यक है। 

पाठ्यक्रम की आवश्यकता एवं महत्व

1. पाठ्यक्रम शिक्षा के उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायता करता है: पाठ्यक्रम का निर्माण शिक्षा के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जाता है यदि हमारे सम्मुख कोई निश्चित पाठ्यक्रम होगा तो हम यह नहीं जान सकते कि हम किन विषयों के ज्ञान और क्रियाओं के प्रशिक्षण से अपने उद्देश्यों की प्राप्ति कर रहे हैं और कौन-सी क्रियाएं निरर्थक है।

2. शिक्षा की प्रक्रिया व्यवस्थित होती है: पाठ्यक्रम ही शिक्षण सामग्री का निर्धारण करता है। इसकी सहायता से यह स्पष्ट किया जाता है कि शिक्षा के स्तर पर विद्यालयों में किन पाठ्य विषयों का कितना ज्ञान एवं किन क्रियाओं में कितनी दक्षता का विकास किया जाएगा। इस प्रकार निश्चित पाठ्यक्रम शिक्षा की क्रिया को व्यवस्थित करता है।

3. समय और शक्ति का सदुपयोगः पाठ्यक्रम की सीमा निश्चित हो जाने के पश्चात् अध्यापक को इस बात की जानकारी मिल जाती है कि उसे क्या पढ़ाना है और विद्यार्थी को यह पता चल जाता है कि उसे क्या पढ़ना है। इससे समय और शक्ति का सदुपयोग करने में सहायता मिलती है।

4. बच्चों की मनौवैज्ञानिक आवश्यकताओं की पूर्ति होती है। निश्चित पाठ्यक्रम बच्चों की मनोवैज्ञानिक प्रवृत्तियों को सन्तुष्ट करने में सहायता प्रदान करता है। मनुष्य एक प्राणी है जो संयोजन क्रियाओं में रुचि लेता है और ऐसा कार्य करना चाहता है कि जिससे उसकी वर्तमान आवश्यकता की पूर्ति होती है और भावी आवश्यकताओं की पूर्ति को सम्भावना बढ़ती है। पाठ्यक्रम का निर्माण इन तीनों बातों को ध्यान में रखकर किया जाता है। इसलिए बच्चा उसे .. पूरा करने में रुचि दिखाता है।

5. पाठ्य-पुस्तक के निर्माण में सुविधाः निश्चित पाठ्यक्रम विभिनन लेखकों को पाठ्य-पुस्तकों का निर्माण करने मेंमार्गदर्शन करता है। लेखक पाठ्य-पुस्तक तैयार करते समय उनमें आवश्यक सामग्री को ही प्रवेश देते हैं।

6.मूल्यांकन करने में आसानी. पाल्पक्रम की सहायता से जच्चों का मूल्यांकन करने में आसानी होती है। विशेष स्तर के लिए पाठ्यक्रम में निर्माण के पश्चात् विद्यार्थियों की योग्यता का मूल्यांकन करना आसान हो जाता है। यदि किसी स्तर के लिए कोई पाठ्यक्रम नहीं होगा, तो अध्यापक बच्चों की योग्यता का मूल्यांकन नहीं कर सकेंगे। 

 

पाठ्यक्रम का विकास 

 

अमेरिका की गणित परिषद तथा गणित अध्यापकों की राष्ट्रीय परिषद् ने सन् 1933 ई. में ‘गणित का शिथा में स्थान का अध्ययन करने के लिए तथा ‘गणित के पाठ्यक्रम का निर्माण करने के लिए एक आयोग का गठन किया। आयोग को गणित के प्रचलित पाठ्यक्रमों में लचीलापन तथा क्रमबद्धता के अभाव के कारण राष्ट्रीय स्तर पर गणित के पाठ्यक्रम के निर्माण में कठिनाईयां हुई। 

आयोग ने निर्धारितत किया कि पूर्व माध्यमिक स्तर पर छात्रों को निम्नलिखित बातों का ज्ञान होना चाहिए

1. जोड़, घटाव, गुणा तथा भाग में संख्या के संचय की क्रियाओं पर अधिकार।

2. आधारभूत प्रत्ययों, प्रक्रियाओं एवं शब्दावली की जानकारी।

3. किसी अंक का विभिन्न संख्याओं में स्थानीय मान तथा दशमलव प्रणाली का ज्ञान।

4, प्रमुख मापन की इकाइयों का ज्ञान।

5. जीवन से संबंधित सामान्य समस्याओं को हल करने में मापन तथा गणनाओं का प्रयोग करने की क्षमता। 6. पूर्ण संख्याओं, साधारण भिन्नों तथा दशमलव भिन्नों की प्रक्रियाओं का ज्ञान।

7. आयत, वर्ग, वृत्त, त्रिभुज, आयताकार, ठोस, गोला, घन आदि को पहचानना एवं इनकी आकृति खींचना। 

‘गणित का सामान्य शिक्षा में स्थान’ का अध्ययन करने के लिए सन् 1940 में एक कमिटी का गठन किया गया। 

इस कमिटी का मुख्य सुझाव यह था कि गणित के अध्ययन द्वारा छात्रों की आवश्यकताओं की संतुष्टि होनी चाहिए। 

ये मुख्य आवश्यकताएं निम्नलिखित हैं

1. वैयक्तिक जीवन संबंधी

2. आर्थिक संबंधी

3. सामाजिक-नागरिक संबंधी

4. तत्कालीन वैयक्तिक-सामाजिक संबंधी 




 

 

पाठ्यक्रम की रचना अथवा निर्माण के प्रमुख सिद्धांत

किसी भी स्तर पर पाठ्यक्रम का निर्धारण करते समय सामाजिक व सांस्कृतिक आधार को ध्यान में रखना अनिवार्य होता है। गणित जैसे महत्वपूर्ण एवं दैनिक जीवन में उपयोगी विषय पर परिस्थितियों के बदलते स्वरूप का असर पड़ता है। इस बात पर विशेष आग्रह चाहिए कि गणित सीखकर बालक दैनिक जीवन के समस्याओं को सामान्य रूप से स्वयं हल कर लें। साथ ही गणित का मनोरंजनक पक्ष भी पाठ्यक्रम निर्धारण में अछूता न रह जाये। बालकों की मानसिक परिपक्वता, रुचि, ग्रहण, शक्ति, जिज्ञासा आदि को भी पाठ्यक्रम निर्धारण में ध्यान देना होगा, तभी पाठ्यक्रम को मनौवैज्ञानिक आधार प्राप्त हो सकेगा। पाठ्यक्रम के लिए बालक नहीं होता है बल्कि पाठ्यक्रम बालक के लिए होता है। अतः पाठयक्रम निर्धारण में बालकों की मनोवैज्ञानिक आवश्यकताओं पर भी विचार करना आवश्यक है। 

उपर्युक्त विवेचन के आधार पर पाठ्यक्रम निर्धारण के मुख्य सिद्धांत इस प्रकार है –

1. बालक को शिक्षण का केन्द्र मानना

2. उपयोगिता का सिद्धांत

3. उच्च शिक्षा की आवश्यकता पूर्ति का सिद्धांत

4. क्रियाशीलता का सिद्धांत

5. अध्यापकों की राय लेने का सिद्धांत

6. लचीलेपन का सिद्धांत

7. अवकाश के सदुपयोग का सिद्धांत

8. गणित-शिक्षण के उद्देश्यों की पूर्ति का सिद्धांत

9. अनुशासनिक मूल्यों का सिद्धांत सहसंबंध का सिद्धांत 

 

उद्देश्यों को व्यवहारगत रूप में लिखने की आवश्यकता

अधिगम उद्देश्यों का निर्धारण, शिक्षण की विभिन्न क्रियाओं को विशिष्ट रूप से प्रस्तुत नहीं करता। इसलिए इनको व्यवहारिक रूप में लिखना आवश्यक हो जाता है। उद्देश्यों को व्यावहारिक रूप में लिखने की निम्नलिखित आवश्यकता तथा महत्त्व है –

1. उद्देश्यों की सहायता से अधिगम अनुभवों की विशेषताओं को निर्धारित किया जाता है।

2. शिक्षण क्रियाओं को सुनिश्चित तथा विशिष्ट बनाने में सहायता मिलती है।

3. अध्यापक के लिए शिक्षण व्यूह रचना के चयन में सहायक है।

4. यह परीक्षण के लिए प्रश्नों के चयन में सहायक है।

5. इनकी सहायता से मूल्यांकन एवं मापन संभव होता है।

6. श्रव्य-दृश्य सामग्री के चयन में सहायता प्रदान करता है।

7. व्यवहार के सभी पक्षों से संबंधित उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए परीक्षा की व्यवस्था करने में सहायक है। 

 



 

ज्ञानात्मक उद्देश्यों को व्यावहारिक रूप में लिखना

ज्ञानात्मक उद्देश्यों को व्यावहारिक रूप में लिखने का श्रेय रार्बट मेगर को जाता है। मेगर ने अभिक्रमित-अनुदेशन की रचना के लिए व्यावहारिक उद्देश्यों को महत्व दिया। प्रत्येक वर्ग के उद्देश्यों को व्यावहारिक रूप में लिखने के लिए मेगर ने कार्य सूचक क्रियाओं की सहायता ली, जिनकी सहायता से अध्यापक उद्देश्यों को व्यावहारिक रूप में लिख सकते हैं। इस प्रकार कार्य-सूचक क्रियाओं की सहायता से बालकों से पूर्व व्यवहार तथा उनकी आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर शिक्षण उद्देश्यों को निर्धारित किया जाता है। विभिन्न प्राप्य उद्देश्यों के लिए दी गई कार्य-सूचक क्रियाओं का चुनाव करके विषय-वस्तु के साथ प्रयुक्त करके उस उद्देश्य का व्यावहारिक रूप लिखा जाता है। उदाहरणार्थ – गणित में ‘लेखाचित्र द्वारा युगपत समीकरणों का हल’ के ज्ञान, बोध व प्रयोग शिक्षण उद्देश्य को व्यवहारिक रूप में अग्र प्रकार लिख सकते हैं – 

प्राप्य-उद्देश्य – ज्ञान

1. बालक ‘युगपत समीकरणों’ का प्रत्यास्मरण कर सकेंगे।

2. बालक युगपत समीकरणों को परिभाषित कर सकेंगे। 

प्राप्त उद्देश्य – बोध

1. बालक सुगपत समीकरणों के उदाहरण दें सकेंगे।

2. बालक युगपत समीकरणों को ग्राफ द्वारा प्रयुक्त कर सकेंगे। 

प्राप्त उद्देश्य – ज्ञानोपयोग

1. बालक युगपत समीकरणों को ग्राफ पर प्रदर्शित कर सकेंगे।

2. बालक युगपत समीकरणों को हल कर सकेंगे। 

गणित परिषद

गणित परिषद्, गणित की पाठ्यक्रम सहगामी क्रियाओं की रीढ़ की हड्डी है। इसका सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि शिक्षण उपलब्धि की दृष्टि से कक्षा से बाहर की गयी वैज्ञानिक क्रियाएं नियमित कक्षा क्रियाओं का मुकाबला करती हैं! अनेक ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं, जिनमें पूर्ववर्ती क्रियाएं अपेक्षाकृत अधिक महत्वपूर्ण सिद्ध हुई है! गणित परिषद में शिक्षा ‘करके सीखना’ पर आधारित होती है, इस कारण यह अधिक रुचिपूर्ण होती है। औपचारिक कक्षा शिक्षण की अपेक्षा यह छात्रों की योग्यता और रुचि के अधिक अनुरूप होती हैं, क्योंकि इसमें किसी प्रकार के निश्चित पठन-पाठन पर अधिक जोर नहीं दिया जाता। इस कारण यहां छात्रों की सृजनात्मक शक्ति का अधिक विकास होता है। 

गणित परिषद के उद्देश्य

1. छात्रों की समस्या समाधान विधि के आधार पर गणित संबंधी अभिरुचि विकसित करना।

2. छात्रों का दैनिक जीवन के प्रति व्यापक दृष्टिकोण विकसित करना।

3. गणित को रोचक कार्य रूप में प्रोत्साहित करना।

4. छात्रों में परस्पर सहयोग एवं स्वस्थ प्रतियोगिता विकिसत करना।

5. अन्वेषणात्मक, रचनात्मक एवं आविष्कारात्मक योग्यताओं को विकसित करना।

6. छात्रों को विज्ञान की नवीनतम प्रगति एवं उसके दैनिक जीवन में उपयोग से परिचित करना।

7. छात्रों में तर्क व निरीक्षण शक्ति विकसित करना।

8. दूसरी विज्ञान परिषदों से सम्पर्क स्थापित करना और उनके साथ सूचनाओं और क्रियाओं का विनिमय करना।

9. जिला, प्रदेशीय, राष्ट्रीय या अंतर्राष्ट्रीय स्तर की परिषदों की सदस्यता प्राप्त करना। 

शिक्षा के मूल्यांकन के प्रमुख उद्देश्य 

  • पाठ्यक्रम में आवश्यक संशोधन करना। 
  • परीक्षा प्रणाली में सुधार करना। 
  • निर्देशन एवं परामर्श (Guidance and Counselling) हेतु उचित अवसर प्रदान करना। 
  • अध्यापकों की कार्यकुशलता एवं सफलता का मापन करना। 
  • बालकों के व्यवहार-सम्बन्धी परिवर्तनों की जांच करना। 

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SCIENCE NOTES-DIGESTIVE SYSTEM-DIGESTION PROCESS

 

 



 

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