Tuesday, 12 November, 2019

MATHS PEDAGOGY FOR CTET-गणितीय शिक्षण में समस्याएं

MATHS PEDAGOGY FOR CTET-गणितीय शिक्षण में समस्याएं

 



गणित शिक्षण में समस्याएं : 

  • गणितीय ज्ञान को शीघ्रता से ग्रहण करने में कठिनाई। 
  • गणित के प्रति रुचि एवं उचित दृष्टिकोण के अभाव। 
  • कक्षा का उदासीन वातावरण। 
  • परिवार का निम्न सामाजिक-आर्थिक (Socio-Economic) स्तरा 
  • माता-पिता के अशिक्षित होने की वजह से सही दिशा-निर्देश नहीं मिल पाता। 
  • घरेलू झगड़े। 
  • हीन भावना एवं आत्मविश्वास की कमी। 
  • स्कूल में पूरी सुविधा न मिल पाना 
  • अध्यापक का अरुचिपूर्ण व्यवहार 
  • शैक्षिक निर्देशन का अभाव।

 

गणित सीखने में त्रुटि के कारण 

  • कार्य का निर्धारण करते समय छात्रों की रुचियों, आवश्यकताओं तथा मानसिक विकास पर ध्यान न देना। 
  • बालकों में तत्परता (readiness) तथा एकाग्रता का अभाव। 
  • बालकों को गणित के प्रति नकारात्मक दृष्टिकोण (Negative attitude) होना। 
  • शीघ्र निर्णय लेने की क्षमता का अभाव। 
  • कल्पना तथा स्मरण शक्ति का अभाव। 
  • समस्या का विश्लेषण तथा संश्लेषण करने की योग्यता की कमी। 
  • बालकों में गणित के प्रति जागरूकता (Alertness) का अभाव। 
  • दिये गये कार्य को समय पर पूरा न करना। 
  • बालकों में गणना सम्बन्धी कुशलताओं का अभाव। 
  • आत्म-विश्वास तथा आत्म निर्भरता का अभाव।



 

गणित शिक्षण की विद्यालयी समस्याएं

आजकल अधिकांश विद्यार्थी गणित विषय में उतने निपुण नहीं हैं जितनी उनसे आशा की जाती है, जिसके मुख्य कारण निम्नलिखित हैं

1.पाठ्यक्रम की संरचना की समस्या : गणित शिक्षण में पाठ्यक्रम की संरचना का बड़ा महत्त्व हैं पाठ्यक्रम सरल से कठिन की ओर ‘बाल केन्द्रित’ तथा ‘हीवन से सम्बन्धित’ सिद्धान्तों पर आधारित होना चाहिए। लेकिन माध्यमिक स्तर पर पाठ्यक्रम की संरचना का व्यवस्थित ना होना भी गणित शिक्षण की एक प्रमुख समस्या है। 

2 व्यक्तिगत भेदों के ज्ञान की समस्या : प्रत्येक छात्र की बुद्धि रुचि, योग्यता, क्षमता, अभिवृत्ति आदि अलग-अलग होती है तथा यही विशेषता शिक्षण की एक समस्या बन जाती है। इन्हीं विशेषताओं के कारण कुछ छात्र तो अध्यापक द्वारा प्रदत्त ज्ञान को आसानी से आत्मसात कर लेते हैं और कुछ देर से कर पाते हैं या बिल्कुल ही नहीं कर पाते। सामान्यतः एक कक्षा में अध्यापक को तीन प्रकार के छात्रों का सामना होता है-मेधावी, सामान्य तथा पिछड़े हुए छात्र। इसी समस्या को व्यक्तिगत भेद की समस्या की संज्ञा दी जाती है। आजकल शिक्षक अपने शिक्षण की व्यवस्था इनके अनुरूप सुचारु रूप से व्यवस्थित करने में असफल हो रहे हैं।

3 प्राथमिक स्तर पर छात्रों की गणितीय नींव का कमजोर होना : माध्यमिक स्तर पर गणित शिक्षण की एक प्रमुख समस्या यह भी है कि छात्रों का प्राथमिक स्तर पर गणित शिक्षण बहुत कमजोर रूप में होता हैं जिस कारण माध्यमिक स्तर पर छात्र गणित को ठीक से नहीं समझ पाते तथा इसी कारण से गणित शिक्षण के प्रति उनकी रुचि कम हो जाती है। जिस कारण माध्यमिक स्तर पर गणित शिक्षण का कार्य सुचारु रूप से नहीं हो पाता जो माध्यमिक स्तर पर गणित की एक प्रमुख समस्या बन जाती है।

4 छात्रों का शारीरिक स्वास्थ्य एवं मानसिक स्वास्थ्य : गणित शिक्षण के अन्तर्गत छात्रों का शारीरिक तथा मानसिक रूप से स्वास्थ्य होना नितान्त आवश्यक है। क्योंकि बालक के ध्यान. रुचि व एकाग्रता पर इसका प्रभाव पड़ता है। किसी भी प्रकार की मानसिक विकृति, शारीरिक रुग्णता तथा मानसिक तनाव का प्रत्यक्ष प्रभाव बालकों के शिक्षण पर प्रतिकूल पड़ता है। शारीरिक एवं मानसिक रूप से अस्वस्थ बालक शीघ्र ही थक जाते हैं।

 

5 अध्यापक का विषय के प्रति सही ज्ञान न होना : अध्यापको को किसी विषय से सम्बन्धित ज्ञान, अनुभव एवं पोम्पा छात्रों को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करो हैं। पदि अध्यापक को अपने विषय की गहन जानकारी नहीं है तो वह छात्रों को बहुत कुछ नहीं दे पाएगा। इसके विपरीत, यदि अध्यापक को अपने विषय का पूर्ण ज्ञान है तो वह आत्मविश्वास के साथ छात्रों को नवीन देने में सक्षम होगा तथा उसका शिक्षण प्रभावी होगा। आजकल गणित शिक्षण से जुड़ी यह एक प्रमुख समस्या है।

6. गणित शिक्षक की शिक्षण विधि : शिक्षण विधि का सीधा सम्बन्ध अधिगम प्रक्रिया से होता है। तथा ही, प्रत्येक शिक्षक का पढ़ाने का तरीका भी भिन्न होता है तथा सभी छात्र एक ही विधि से नहीं सीख पाते। शिक्षण की विधि जितनी अधिक वैज्ञानिक एवं प्रभावशाली होगी उतनी ही सीखने की प्रक्रिया सरल एवं लाभप्रद होगी। बच्चों के सन्दर्भ में खेल विधि द्वारा सीखना, करके सीखना, निरीक्षण द्वारा सीखना, योजना विधि द्वारा सीखना, खोज विधि द्वारा सीखना आदि का अपना अलग-अलग महत्त्व है। लेकिन शिक्षक छात्रों की रुचि के अनुरूप उन्हें शिक्षा न देकर पुरानी विधि यों पर ही निर्भर रहते हैं।




 

7 अभ्यास के उचित विभाजन की व्यवस्था न होना : अभ्यास, गणित शिक्षण का एक महत्त्वपूर्ण अंग है। गणित शिक्षण में अभ्यास का उचित विभाजन नहीं है, गणित शिक्षण में अभ्यास का मापदण्ड आवश्यक है। अभ्यास उतना होना चाहिए जितना कि छात्र उसे बिना थकावट का अनुभव करे कर सके तथा यह प्रक्रिया निरन्तर होनी चाहिए। माध्यमिक स्तर पर गणित शिक्षण में अभ्यास की प्रकिया का स्वरूप एक समान नहीं है जो गणित शिक्षण में एक प्रमुख समस्या है। आवश्यकता से अधिक अभ्यास कराने से सीखने की क्षमता का ह्रास होता है। गणित शिक्षण का समय एवं अवधि : यदि छात्र अधिक देर तक किसी क्रिया को करता रहता है तो वह थकान का अनुभव करने लगता है और थकान अनुभव होने से सीखने की प्रक्रिया में शिथिलता उत्पन्न हो जाती है। विद्यालयों में समय-चक्र बनाते समय इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि गणित जैसे कठिन विषयों को पहले तथा सरल विषयों को समय-चक्र में बाद में पढ़ाने को व्यवस्था बनाई जाए साथ हो मध्यान्तर को व्यवस्था को आवश्यक रूप यम चक्र में इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि एक कक्षा में समय अवधि कितनी है

१ शिक्षक का व्यवहार : शिक्षक का व्यवहार छात्रों के सीखने को प्रतयक्ष रूप से प्रभावित करता है। शिक्षक में एक आदर्श शिक्षक के सभी गुण होने चाहिए। उसके व्यवहार में सहानुभूति, सहयोग, समानता, शिवाण कला में निपुणता, मृदुभाषी, संयम आदि गुण हैं तो छात्र कक्षा वातावरण में सहज रूप से सब कुछ सीख सकेंगे। लेकिन यदि शिक्षक का व्यवहार अत्यत्न कठोर है तो छात्र उसकी कक्षा से पलायन करने लगते हैं, जो शिक्षण के दौरान एक प्रमुख समस्या है। 

10 गणित शिक्षण के लिए उचित वातावरण का न होना : विद्यालयों में गणित शिक्षण के लिए उचित वातावरण की समस्या आज गणित शिक्षण की एक प्रमुख समस्या बन है। गणित शिक्षण में गणित कक्ष, गणित, प्रयोगशालाओं, पुस्तकालय, कक्षा-कक्ष में प्रकाश व वायु की व्यवस्था आदि का उत्तम प्रबन्ध न होना प्रमुख है। 

उपचारात्मक शिक्षण

 

उपचारात्मक परीक्षण व्यक्ति की जांच करने के पश्चात किसी एक या अधिक क्षेत्रों में उसकी विशेषताओं एवं कमियों को व्यक्त करता है। परीक्षाओं का मुख्य उद्देश्य शिक्षण-अधिगम की परिस्थितियों को प्रभावशाली बनाना है।

 

उपचारात्मक परीक्षण के उद्देश्य

उपचारात्मक शिक्षण हेतु प्रत्येक स्तर तथा अध्याय पर एक परीक्षण तैयार किया जाता है। उपचारात्मक पदों की व्याख्या करने से पहले उस परीक्षण के उद्देश्य देना आवश्यक है। उपचारात्मक परीक्षण के निम्न उद्देश्य हैं 1. छात्रों के विषय संबंधी विकास में रुकावट आने वाले तत्वों को जानना तथा उपचारात्मक सुझाव देना।

2. गणित में कमजोरी आंकना और उसके आधार पर सामूहिक उपचारात्मक पद्धति अपनाना।

3. अध्ययन पद्धतियों का दिशा निर्देशन करना।

4. गणित विषय के शिक्षण तथा अध्ययन में सुधार लाना यह छात्र तथा शिक्षक दोनों के लिए लाभदायक होता है। यदि छात्र किन्हीं गणित के प्रत्ययों को स्पष्ट नहीं समझते हैं तो शिक्षक को अपनी विधि में परिवर्तन लाना होता है।

5. कक्षा में गणित में पिछड़े बालकों को पहचानना जिससे सुधार हेतु निदान संभव हो सके।

6. पाठ्यक्रम तथा पाठ्य-वस्तु में कमियों के आधार पर परिवर्तन लाना जिससे वे छात्रों के लिए उपयोगी हों

7. छात्रों की कमियों को जानने हेतु उपयुक्त मूल्यांकन प्रक्रिया का प्रयोग करना। 

विद्यालय में उपचार हेतु निम्न व्यवस्था करनी चाहिए

1. छात्रों की कमजोरी के आधार पर छोटे-छोटे समूह बनाकर अलग-अलग शिक्षण की व्यवस्था की जानी चाहिए।

2. गणित के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में जिनमें छात्रों की अधिक कमजोरी होती है उनमें गोष्ठियों का आयोजन कराया जाये। इनके द्वारा भी छात्रों की कमजोरी दूर की जा सकती है।

3. छात्रों की कमजोरी को दूर करने हेतु उसी पाठ्य-वस्तु को दोहराना चाहिए। इससे उनकी कमजोरी की पहचान की जानी चाहिए।

4. गणित के क्षेत्र में छोटे छोटे प्रोजेक्ट तथा समस्याएं देनी चाहिए। इसके द्वारा कक्षा शिक्षण में जो प्रत्यय एपष्ट न हो सके हों वे स्पष्ट हो जाते हैं।

5. छात्रों को अध्याय की समाप्ति पर अभ्यास तथा गृह-कार्य दिया जाना चाहिए इससे जो कुछ कमजोरी रह गयी हो वह दूर हो जाती है। 

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ENVIRONMENT  PRACTICE PAPER FOR CTET/UPTET

 



 

 

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