Wednesday, 26 February, 2020

ENVIRONMENT NOTES-TROPHICLEVELS-FOOD CHAINS-FOOD WEB

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पोषण स्तर (Trophiclevels)

पारितंत्र एक मूलभूत इकाई है जिसमें प्राकृतिक सम्मिश्र समुदाय रहते हैं जो एक, दो, तीन अथवा चार चरणों में पौधों से आहार प्राप्त करते हैं और उसी के अनुसार इन चरणों को प्रथम, द्वितीय, तृतीय तथा चतुर्थक पोषण स्तर (trophic levels, trophe : पोषण) अथवा आहार स्तर कहते हैं। आइए देखें कि वे कौन-कौन से पोषण स्तर हैं जिनमें स्वपोषी तथा भिन्न प्रकार के विषमपोषी आते हैं : 

  • हरे पौधे (उत्पादक); पोषण स्तर I – स्वपोपी
  • शाकभक्षी (प्राथमिक उपभोक्ता); पोषण स्तर II विषमपोषी
  • मांसभक्षी (द्वितीयक उपभोक्ता); पोषण स्तर III – विषमपोषी
  • मासभक्षी (तृतीयक उपभोक्ता); पोषण स्तर IV-विषमपोषी 
  • शीर्ष मांसभक्षी (चतुर्थक उपभोक्ता); पोषण स्तर V- विषमपोषी 

 

इस प्रकार ऊर्जा भी विभिन्न पोषण स्तरों में से प्रवाहित होती है : उत्पादकों से होती हुई बाद के पोषण स्तरों में  यह ऊर्जा सदैव निम्नतर (उत्पादक) स्तर से उच्चतर (शाकभक्षी, मासभक्षी आदि) पोषण स्तरों में को जाती है। यह उल्टी दिशा में यानी मांसभक्षियों से शाकभक्षियों और फिर उत्पादकों में को कभी प्रवाहित नहीं होती। एक और बात भी है कि प्रत्येक पोषण स्तर पर कुछ ऊर्जा की हानि होती है जो अनउपयोगशील ऊष्मा के रूप में होती है, इसीलिए प्रथम पोषण स्तर से ही ऊर्जा का स्तर घटता जाता है। जिसका परिणाम यह होता कि केवल चार या पांच पोषण स्तर ही होते हैं और छः से ज्यादा शायद ही कभी हों क्योंकि उसके बाद जीव को सहारा देने के लिए ऊर्जा बहुत ही कम बचती है। पोषण स्तरों के अध्ययन से हमें पता चलता है कि पारितंत्र में ऊर्जा परिवर्तन किस प्रकार होता है। साथ ही इससे हमें एक उपयोगी संकल्पनात्मक आधार भी मिलता है कि एक ही प्रकार की सामान्य अशन विधि वाले जीवों को एक ही समूह में रखा जा सकता है और उन सबको एक ही पोषण स्तर का दर्जा दिया जाता है। इससे पता चलता है कि एक ही पोषण स्तर पर आने वाले जीव अपने भोजन को उत्पादक से समान संख्या के चरणों या पोषण स्तर तक आने के बाद ही प्राप्त करते हैं। पोषण स्तरों को उन चरणों की संख्या के अनुसार संख्या दी जाती है जो आहार अथवा ऊर्जा-स्रोत यानी उत्पादक से जितनी दूर होते हैं। 

खाद्य श्रृंखलाएं (Food chains) 

एक-दुसरे को खाने वाले जीवों का अनुक्रम एक खाद्य श्रृंखला बनाता है जैसा कि चित्र में दिखाया गया है। चित्र में दिया गया तीर का निशान उत्पादक से उपभोक्ता की ओर पोषको तथा ऊर्जा की दिशा और गति दर्शाता है! पोषण स्तरों की ही तरह और उन्हीं कारणों के आधार पर खाद्य श्रृंखला की कड़ियां तथा चरण भी प्रायः चार या पांच ही होते हैं। 

 

तालाब की एक खाद्य श्रृंखला कछ प्राणी केवल एक ही प्रकार का आहार करते हैं और इसलिए वे एक ही खाद्य शंखला के सदस्य होते हैं। अन्य प्राणी अलग-अलग प्रकार के भोजन करते हैं इसलिए वे न केवल विभिन्न खाद्य-श्रृंखला के ही सदस्य होते हैं वरन् अलग-अलग खाद्य- शृंखलाओं उनके स्थान यानी पोषण स्तर भी अलग-अलग हो सकते हैं और इस प्रकार उनकी स्पीशीज की उत्तरजीविता सुनिश्चित होती है। कोई प्राणी एक खाडा- शृंखला में हो सकता है कि प्राथमिक उपभोक्ता हो जिसमें वह पौधे खाता हो तथा अन्य श्रृंखलाओं में वह द्वितीयक अथवा तृतीयक उपभोक्ता भी हो सकता है जिनमें वह शाकभक्षियों को खाता हो अथवा मांसभक्षियों को। 

चूंकि मानव न तो प्रकाश ऊर्जा की मात्रा बढ़ा सकता है और ऊर्जा-स्थानांतरण के दक्षता में भी बहुत मामूली-सा ही कुछ कर सकता है इसलिए ऊर्जा प्राप्ति के लिए वह केवल खाद्य श्रृंखलाओं को छोटा ही कर सकता है, अर्थात् प्राणियों को न खाकर प्राथमिक उत्पादकों यानी पौधों को खाता है।  बहुत अधिक जनसंख्या वाले देशों में लोग शाकाहारी बनने की ओर प्रवृत्त होते हैं क्योंकि तब खाद्य श्रृंखला सबसे छोटी होती है और इस विधि से भूमि का एक निर्दिष्ट क्षेत्र भी काफी संख्या में लोगों का भरण पोषण कर सकता है। मान लीजिए एक किसान ने गेहूं और सब्जियों की फसल प्राप्त की है। वह इसे या तो सीधे ही खा सकता है या अपनी बकरियों को खिलाकर उन बकरियों को खा सकता है। एक निर्दिष्ट भूमि क्षेत्र पर शाकाहारी भोजन पर ज्यादा बड़ी संख्या में लोगों का पेट भरा जा सकता है जबकि उतनी ही भूमि पर मांसाहारी भोजन पर कम संख्या में लोग जीवित रह सकेंगे। तो इस प्रकार सूर्य की ऊर्जा को सर्वाधिक कारगर रूप में तभी उपयोग किया जा सकता है जब लोग शाकाहारी हों। 



 

खाद्य श्रृंखलाओं के प्ररूप (Types of food chains) 

प्रकृति में दो मुख्य प्रकार की खाद्य शृंखलाएं पायी जाती हैं चारण खाद्य श्रृंखला (Grazing food chain): वे उपभोक्ता जो भोजन के रूप में पौधों अथवा पौधों के भागों का उपयोग करके खाद्य श्रृंखला आरम्भ करते हैं, चारण खाद्य श्रृंखला बनाते हैं। यह खाद्य श्रृंखला हरे पौधों से आरम्भ होती है तथा प्राथमिक उपभोक्ता शाकभक्षी होता है

उदाहरण के लिए घास → ड्डिा → पक्षीगण → बाज अथवा शिकारी

 

खाद्य श्रृंखला (Detritus food chain) :

यह खाद्य श्रृंखला क्षय होते प्राणियों एवं पादप शरीर के मृत जैविक पदार्थ से आरम्भ होकर सूक्ष्मजीवों में जाती और फिर वहां से अपरद खाने वाले जीवों में आती है जिन्हें अपरदभक्षी अथवा विघटक कहते हैं और फिर वहां से अन्य परभक्षियों में पहुंचती है।

कचरा → स्प्रिंगटेल (कीट) → छोटी मकड़ियां (मांसभक्षी) 

इन दो खाद्य श्रृंखलाओं के बीच का अंतर प्रथम स्तर उपभोक्ताओं के लिए ऊर्जा के स्रोत का है। चारण खाद्य श्रृंखला में ऊर्जा का प्राथमिक स्रोत सजीव पादप जैवसंहति है जबकि अपरद आहार श्रृंखला में ऊर्जा का स्रोत मृत जैविक पदार्थ अर्थात् अपरद है। ये दोनों खाद्य शृंखलाएं संबंधित हैं। अपरद खाद्य श्रृंखला में आरम्भिक ऊर्जा स्रोत वह वर्ण्य पदार्थ एवं मृत जैविक पदार्थ है जो चारण खाद्य शृंखला से आया हुआ है। 

खाद्य-जाल (Food webs)

खाद्य श्रृंखला में पारितंत्र में होने वाले खाद्य अथवा ऊर्जा प्रवाह का केवल एक ही पहलू प्रस्तुत करता है और उससे यह अर्थ निकलता है कि जीवों में एक सीधा, सरल, शेष से पृथक संबंध होता है जो पारितंत्रों में शायद ही कभी होता हो। पारितंत्र के भीतर अनेक परस्पर संबंधित खाद्य श्रृंखलाएं हो सकती हैं। अधिकतर, वही एक खाद्य संसाधन एक से अधिक श्रृंखलाओं को अंश हो सकता है विशेषकर तब, जबकि वह संसाधन किसी एक निम्नतर पोषण स्तर पर हो। उदाहरण के लिए एक ही पौधा एक ही समय अनेक शाकभक्षियों का आहार हो सकता है, जैसे घास पर खरगोश अथवा टिड्डा या बकरी या गाय सभी निर्भर हो सकते हैं। इसी प्रकार एक शाकभक्षी अनेक विभिन्न मांसभक्षी स्पीशीज का भोजन हो सकता है। साथ ही यह भी हो सकता है कि अलग-अलग ऋतुओं में आहार की उपलब्धता और शाकभक्षियों की तथा मांसभक्षियों की भी पसंद भी बदलती रहती है, जैसे गर्मियों में हम तरबूज खाते हैं तथा जाड़ों में नाशपतिया। इस प्रकार अशन संबंधों का एक परस्पर संबंधित जाल बन जाता है जो खाद्य-जालों (Food webs) का रूप ले लेते हैं खाद्य जाल में ऊर्जा तथा पोषकों के वे सभी संभावित स्थानांतरण दर्शाए जाते हैं जो किसी पारितंत्र में रहने वाले सभी जीवों में हो सकते हैं, परन्तु खाद्य श्रृंखला में आहार का केवल एक ही दिशामार्ग दिखाया गया होता है। 

 

एक प्रारूपी थल खाद्य जाल में दर्शाए गए प्राथमिक उत्पादकों, उपभोक्ताओं तथा विघटकों का सम्मिश्र जाल, जिसमें विभिन्न पोषण स्तरों को रोमन संख्याओं से दर्शाया गया है। 

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