Tuesday, 12 November, 2019

 Emotional Development-संवेगात्मक विकास अर्थ एवं परिभाषा IN PDF

 Emotional Development for ctet uptet notes

 Emotional Development-संवेगात्मक विकास अर्थ एवं परिभाषा IN PDF

 



 

संवेग शब्द का अर्थ एवं परिभाषा –

 संवेग शब्द अंग्रेजी के ( Emotion ) शब्द से लिया गया है। संवेग एक भावात्मक स्थिति है जब मनुष्य का शरीर उद् दीप्त होता है। इसी अवस्था को संवेग का नाम दिया गया हैं। उदाहरण के रूप में भय ,क्रोध,चिन्ता,हर्ष,प्रसन्नता आदि उद् दीप्त अवस्थाए हैं। हम यह भी कह सकते है यह एक बहुत ही उत्तेजित अवस्था है जिस के करण वह अधिक मानसिक सजगता के करण कोई प्रतिक्रिया करता है। संवेग एक कल्पित प्रत्यय है जिसकी विशेषताओं का अनुमान व्यवहार से लगाया जाता है। संवेग में भाव, आवेश तथा शारीरिक प्रतिक्रियाएं सम्मिलित है।

विद्वानों ने संवेंग की अलग – अलग परिभाषाएं दी हैं 

मैक्डूगल के अनुसार – “ संवेग मूल प्रवृत्ति का केन्द्रीय अपरिवर्तनशील तथा आवश्यक पहलू है। “

बैलेनटाइन के अनुसार – “ जब भावात्मक दशा तीव्रता में हो जाए, तो उसे हम संवेग कहते हैं।”

आर्थर टी . जर्सीलड के अनुसार – “ संवेग शब्द किसी भी प्रकार से आवेश में आने, धड़क उठने तथा उत्तेजित होने की दशा को सूचित करता है। “

रास के विचार में – “ संवेग चेतना की वह अवस्था है जिसमें भावात्मक तत्व की प्रधानता रहती है। “

बुडवर्थ के अनुसार – “ संवेग किसी प्राणी की हलचल-पूर्ण अवस्था है।

 

संवेगात्मक विकास को प्रभावित करने वाले निम्नलिखित कारण हैं –

1.परिपक्वता का महत्त्व –

संवेगात्मक विकास में परिपक्वता का बुहत ही ज्यादा महत्त्व है। इस सम्बन्ध में गुडएनफ एवं जोनस द्वारा किये गये अध्ययन इस बात की पुष्टि करते हैं कि संवेगों के विकास में परिपक्वता महत्वपूर्ण प्रभाव डालती है।

2.सीखने का महत्व –

 संवेगों के विकास में सीखने का महत्वपूर्ण स्थान है तथा सीखने की भिन्न विधियां जैसे – प्रमाण एवं मूल विधि अनुकरण, निरीक्षण तथा अनुबन्धन विधि संवेगों के विकास को महत्त्वपूर्ण ढंग से प्रभावित करती है।

3.बुद्धि –

बालक की संवेगात्माकता को बुद्धि भी प्रभावित करती है। बुद्धि के द्वारा ही बच्चे संवेगात्मक की परिस्थिति का प्रत्यक्षीकरण करते है तथा संवेगात्मक अभिव्यक्ति के लिए बच्चे निर्णय लेते है।

4.लिंग भेद –

बालक एवं बालिकाओं के संवेगों के विकास में तथा संवेगें की मात्रा में भी महत्वपूर्ण अन्तर पाया जाता है।
माता – पिता पुत्र सम्बन्ध – बच्चों में माता – पिता के पारस्परिक सम्बन्धों का भी संवेगों पर प्रभाव पड़ता है। माता – पिता द्वारा बच्चों का अतिसंरक्षण व अधिक लाड़ प्यार के कारण बच्चे आत्म निर्भर नही हो पाते, जिसके कारण वे कम चिन्ता वाले किन्तु अधिक क्रोध प्रदर्शित करने वाले हो जाते हैं तथा जो माता पिता बच्चों के साथ कठोरतापूर्वक व निर्दयतापूर्वक व्यवहार करते हैं उनके बालक शर्मीले तथा भयभीत बन जाते हैं।

5.परिवार का आकार –

बच्चों के संवेगात्मक विकास पर परिवार के आकार का महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। अध्ययनों में यह पाया गया है कि बड़े परिवारों में संवगों का विकास शीघ्र एवं तीव्रता से होता है तथा बड़े परिवारों के बच्चे संवेगों को जल्दी अभिव्यक्त करना सीख लेते है। छोटे परिवारों में अपेक्षाकृत संवगों का विकास मंद गति से होता है।
व्यक्तित्व – व्यक्ति के व्यक्तित्व का भी संवेगों पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। अध्ययनों में यह देखा गया है कि बहिर्मुखी व्यक्तियों में भय की मात्रा अधिक तथा अन्तुर्मखी व्यक्तियों में भय की मात्रा कम माई जाती है, क्योकि बहिर्मुखी व्यक्तित्व के व्यक्तियों को अनुकरण के ज्यादा अवसर प्राप्त होते हैं।

6.मां बाप की गलत सोच –

 कुछ अभिभावक पुराने विचारों के होते हैं। वह यह मानकर चलते हैं कि स्वस्थ बच्चा प्रसन्न बच्चा होता हैं। वे बच्चे के शारीरिक स्वास्थ्य पर तो ध्यान देते हैं लेकिन मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं देते है। वे बच्चे के पालन पोषण में बाल मनोविज्ञान की तरफ बिल्कुल ध्यान नहीं देते। वे इस बात का अनुभव नहीं करते कि यदि बच्चों के प्रति प्यार दर्शाया न जाए तो बच्चे स्वंय इस बात का अनुभव नहीं कर सकते। बच्चे की तर्कशक्ति इतनी विकसित नहीं होती कि वह समझ पाएं कि मां – बाप की डांट के पीछे उनका प्यार छिपा है। इसी कारण यह देखने में आता है कि बच्चा स्वस्थ तो होगा लेकिन वह प्रसन्न नहीं होगा।

7.सामाजिक वातवरण –

 बच्चा जिस प्रकार के सामाजिक वातावरण में रहता है वैसे ही बच्चे में संवेग उत्पन्न होते है। उदाहरण के लिए यदि कोई बालक ऐसे लोगों के बीच रहता है जहाँ पर हर समय लड़ाई झगड, मारपीट होता रहता है तो ऐसे में निश्चय ही बालक में क्रोध के संवेग का विकास हो जाएगा। अतः सामाजिक वातवरण संवेगों के विकास को प्रभावित करता है।

8.सामाजिक आर्थिक स्तर –

अनेक अध्ययनों से पता चलता है कि उच्च आर्थिक स्तर के परिवार के बालकों में संवेगात्मक स्थिरता अधिक व निम्न आर्थिक स्तर के परिवार के बालकों में संवेगात्मक स्थिरता कम पाई जाती है। हरलाँक के अनुसार निम्न सामाजिक – आर्थिक स्तर के बालकों में हिंसा सम्बन्धी भय अधिक मात्र में जबकि सामाजिक आर्थिक स्तर के परिवार के बालकों में भय अपेक्षाकृत कम मात्रा में पाया जाता है।

9.शारीरिक स्वास्थ्य –

 हरलाँक के अनुसार – दुर्बल बालकों में संवेगात्मक अस्थिरता अधिक मात्रा में पाई जाती है। इसके कारण बच्चों को क्रोध अधिक आता है, जबकि अच्छे शारीरिक स्वास्थ्य वाले बालकों में संवेगात्मक स्थिरता अधिक देखने को मिलती है।

10.बच्चे पर आवश्यकता से अधिक दबाव –

 यह स्वाभाविक तौर पर जरूरी है कि चोट लगने पर बच्चा चिल्लाए, भयभीत होने पर चीखे। लेकिन आमतौर पर बालकों पर शुरू से ही दबाव डाला जाता है कि वह अपनी भावनाओं को दबायें रखे। शुरू में ही मां – बाप, भाई बहन या अन्य व्यक्ति उसे यह सिखाते हैं कि शांत रहना चाहिए, क्रोध नहीं करना चाहिए । ऐसे करने से बालक का समुचित संवेगात्मक विकास नहीं हो पाता।

11.विद्यालय का वातावरण –

स्कूल के वातावरण में अध्यापकों का व्यवहार, अध्यापन का स्तर, पाठ सम्बन्धी क्रियाएँ आदि बालकों के संवेग विकास को किसी न किसी रूप में अवश्य प्रभावित करते हैं।
आस – पड़ोस का प्रभाव – बालकों के आस – पड़ोस के रहने वाले लोगों का व्यवहार भी बालकों के संवेगों को प्रभावित करता है। अच्छे समुदाय में पालन पोषण से संवेग परिपक्व होते हैं।

14.मित्र मंडली का प्रभाव –

बालक जिस प्रकार की मित्र मंड़ली में रहेगा, उसी प्रकार का संवेगात्मक विकास उसमें होगा। बुरी संगति सें बच्चे गाली गलौच करना तथा लड़ाई – झगड़ा सीखते हैं ।

15.दिनचर्या में परिवर्तन –

 यदि बच्चे की दिनचर्या में लगातार परिवर्तन होता रहेगा तो उसका स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाएगा। यदि खाने के समय बच्चें को भोजन नहीं मिलता तो वह क्रोधित हो उठेगा।

 

संवेगात्मक विकास में अध्यापक की भूमिका

 



यदि बच्चों के संवेगों को उचित समय पर सही दिशा दी जाए तो इनका प्रयोग सकारात्मक रूप से हो सकता है। इस संदर्भ में अध्यापक की भूमिका विशेष महत्त्व रखती है। कारण यह है कि बच्चा घर की अपेक्षा स्कूल मे अधिकतर समय व्यतीत करता है। वहाँ वह अध्यापक के संपर्क में बार – बार आता है। इसलिए अध्यापक उसके संवेगों को सही दिशा दे सकता है। इस संदर्भ में निम्नीलखित बातें उल्लेखनीय हैं –

1.संवेगों की अभिव्यक्ति प्रदान करना –

 अध्यापक का यह कर्तव्य बनता है कि वह अपने विद्यार्थियों को अपने संवेग प्रकट करने के उचित अवसर प्रदान करे। अन्य शब्दों में हम कह सकते हैं कि विद्यालय की सभी क्रियाएं विद्यार्थी केन्द्रित होनी चाहिए। विद्यार्थियों की आवश्यकताओं और समस्याओं का उचित निदान होना चाहिए। आवश्यकताओं की यह पूर्ति उनके संवेगों के विकास को सही दिशा दे सकती है।

2.अध्यापक का आदर्श व्यक्तित्व –

विद्यार्थी हमेशा अध्यापक का ही अनुसरण करते है। अतः संवेगात्मक रूप से अध्यापक को सुसंगठित तथा अनुशासित होना चाहिए । अध्यापक का यह आदर्श रूप ही विद्यार्थियों के संवेगों को एक नई दिशा दे सकता है।

 




 

3.स्नेहपूर्णो व्यवहार प्रदान करना –

 अध्यापक को अपने बच्चों के साथ स्नेहपूर्ण तथा सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार करना चाहिए। यह तभी संभव है जब अध्यापक बच्चों के व्यक्तित्व का सम्मान करेगा और उन्हे अनावश्यक रूप से अपमानित नहीं करेगा। अध्यापक अपने संवेगों को नियंत्रित करके स्नेह, सम्मान तथा सहयोग दे सकता है।

4.सीखने के प्रक्रिया में संवेगों का योगदान –

 सीखने की प्रक्रिया में संवेगों का विशेष योगदान रहता है परन्तु इस प्रक्रिया में संवेगों का सन्तुलन भी जरूरी है। स्वस्थ और नियंत्रित संवेग सीखने की प्रक्रिया को सफल बनाते हैं और यह सब अध्यापक के व्यवहार पर नियंत्रित होता है।

5.बच्चों के शारीरिक और स्वस्थ विकास में अध्यापक का योगदान –

बालक के संवेगात्मक तथा शारीरिक विकास में गहरा सम्बन्ध है। एक सफल अध्यापक ही इस सम्बन्ध को विकसित कर सकता है। सर्वप्रथम अध्यापक को बच्चों के शारीरिक विकास और स्वास्थ्य का प्रशिक्षण करना चाहिए। तत्पश्चात् बच्यों के माता – पिता से सहयोग प्राप्त करकें बच्चों का उचित मार्ग दर्शन कर सकता है। ऐसा करने से बच्चों और किशोरों का संवेगात्मक विकास अनुकूल दिशा में प्रभावित होगा।

6.माता – पिता का सहयोग –

बच्चों के संवेगात्मक विकास में माता – पिता तथा अन्य सदस्यों का भी महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। माता – पिता ही अध्यापक को बच्चों के बारे में सही जानकारी दे सकते हैं। पारिवारिक पृष्ठभूमि को जानने के बाद अध्यापक बच्चों की रुचियों तथा आवश्यकतओं तथा उनके दैनिक व्यवहार में आवश्यक योगदान दे सकता है।

 

इस प्रकार हम देखते हैं कि बच्चों के संवेगों का सकारात्मक विकास करने में अध्यापक की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। क्योंकि बच्चा अपना अधिकतर समय स्कूल में ही व्यतीत करता है। स्कूल का अनुशासित वातावरण और अध्यापक का मर्गादर्शन बच्चों के संवेगों का सही दिशा में विकास करता है।

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